झारखंड HC ने रांची DCLR पर लगाया 25 हजार का जुर्माना, 7 जनवरी कोर्ट बुलाया

रांची(एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड हाईकोर्ट ने न्यायिक आदेशों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों के प्रति अपनी सख्ती एक बार फिर दिखाई है। अनिल कुमार सिंह बनाम झारखंड राज्य सरकार से जुड़े एक अवमानना याचिका मामले में कोर्ट ने रांची के डिप्टी कलेक्टर लैंड रिफॉर्म्स (डीसीएलआर) मुकेश कुमार पर 25 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है। न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की एकल पीठ ने अधिकारियों की ‘सुस्ती’ पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि कोर्ट का आदेश पारित हुए एक साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन इसका अनुपालन नहीं किया गया।
कोर्ट ने डीसीएलआर रांची को निर्देश दिया है कि एक सप्ताह के अंदर याचिकाकर्ता के नाम से 25 हजार रुपये का डिमांड ड्राफ्ट हाईकोर्ट में जमा करें। यदि ऐसा नहीं हुआ तो 7 जनवरी 2026 को डीसीएलआर को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना पड़ेगा। यह मामला जमीन विवाद से जुड़ा है, जो दशकों पुराना है और आम नागरिकों के लिए न्यायिक प्रक्रिया में देरी की गंभीर समस्या को उजागर करता है।
मामला क्या है? यह विवाद वर्ष 1963 से शुरू होता है। रांची के लालगुटुआ मौजा में देवकली देवी नामक एक महिला ने 43 डिसमिल जमीन खरीदी थी। उन्होंने इसका म्यूटेशन (नामांतरण) करवा लिया और नियमित रूप से रसीद भी कटवाती रहीं। जमीन पर उनका वैध कब्जा था। लेकिन वर्ष 2000 में पुराने मालिक के कुछ रिश्तेदारों ने कथित तौर पर धोखाधड़ी से उसी जमीन को अजीत कुमार बरियार नामक व्यक्ति को बेच दिया। इससे दोहरी जमाबंदी (रजिस्टर) खुल गई, जो कानूनी रूप से गैरकानूनी थी।
इस अन्याय के खिलाफ देवकली देवी के पुत्र अनिल कुमार सिंह ने कानूनी लड़ाई लड़ी। वर्ष 2007 में दायर रिट याचिका (संख्या 2493/2007) पर झारखंड हाईकोर्ट ने 11 जनवरी 2024 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने अजीत कुमार बरियार और अन्य के नाम पर खोली गई दोहरी जमाबंदी को अवैध घोषित कर दिया और मूल मालिक देवकली देवी के वारिसों के पक्ष में आदेश पारित किया। कोर्ट ने डीसीएलआर रांची को निर्देश दिया कि वे इस आदेश का तुरंत अनुपालन करें और जमाबंदी सुधारें।
लेकिन एक साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद डीसीएलआर कार्यालय ने कोई कार्रवाई नहीं की। इससे तंग आकर याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अधिकारियों की लापरवाही पर तीखी टिप्पणी की और कहा कि न्यायिक आदेशों का पालन न करना अदालत की अवमानना है।
याचिकाकर्ता की पैरवीः याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विशाल कुमार राय ने मजबूत पैरवी की। उन्होंने कोर्ट के समक्ष तथ्य रखे कि आदेश के बावजूद जमीन पर मूल वारिसों का हक बहाल नहीं किया गया, जिससे परिवार को लगातार परेशानी झेलनी पड़ रही है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला? झारखंड में जमीन विवाद आम हैं, खासकर पुरानी रजिस्ट्री और धोखाधड़ी वाली बिक्री के मामलों में। ऐसे मामलों में राजस्व अधिकारियों की सुस्ती अक्सर न्याय को लंबा खींचती है। हाईकोर्ट का यह कड़ा रुख अधिकारियों को संदेश देता है कि अदालती आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इससे आम लोगों में न्यायिक व्यवस्था पर भरोसा बढ़ेगा।
एक्सपर्ट मीडिया न्यूज लगातार ऐसे मामलों पर नजर रखे हुए है, जहां सरकारी सुस्ती से नागरिकों का हक प्रभावित होता है। यदि आपके पास भी कोई ऐसा मामला है हमें सूचित करें।










