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बिहार में ‘3 इडियट्स’ की हकीकत: इंजीनियरिंग कॉलेजों में आत्महत्या की बढ़ती फेहरिस्त

राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘3 इडियट’ फ़िल्म में भारतीय शिक्षा प्रणाली की आलोचना की गई है, जो रटने पर आधारित है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार रैंचो का मानना है कि ‘ज्ञान का पीछा करो, सफलता अपने आप तुम्हारे पीछे आएगी’। वहीं चतुर रामालिंगम का चरित्र ‘अंधाधुंध रटाई’ का है। साथ ही इस फिल्म में जॉय लोबो और पिया (करीना कपूर)के भाई जैसे पात्र बताते हैं कि किस तरह माता-पिता और शिक्षा प्रणाली का दबाव छात्रों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर कर सकता है…

पटना (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। राजधानी पटना से 50 किलोमीटर दूर नालंदा के चंडी प्रखंड मुख्यालय स्थित नालंदा कॉलेज आफ इंजीनियरिंग में बुधवार को सिविल ब्रांच के द्वितीय वर्ष की छात्रा सोनम मंडल की संदेहास्पद मौत की घटना न कोई पहली है और‌ ना आखिरी। पिछले कुछ साल में बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों में छात्र -छात्राओं की कथित आत्महत्या या आत्महत्या का प्रयास की घटनाएं बढ़ी है। अगर कहें बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेज ‘कोटा’ बनता जा रहा है तो ग़लत नहीं होगा।

कहने को इंजीनियरिंग एक भविष्य की उम्मीद का सपना है। लेकिन इन दिनों इन कॉलेजों  में किताबों की धूल नहीं, चुप्पी की राख उड़ रही है। क्लासरूम की खामोशी अब सिर्फ बोर्ड की चिकनाई नहीं सुनाती, बल्कि उन बच्चों की चीखें छुपाए बैठी है। जो कभी इंजीनियर बनकर मां की थकान मिटाना चाहते थे। और अब वो ‘ड्राप्पर’ की लिस्ट से सीधे आत्महत्याओं के लिस्ट में दर्ज हो रहे हैं।

बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेज एवं उसके हॉस्टलों में आजकल मेस के खाने से ज़्यादा सिलेबस के पन्ने चबाए जा रहे हैं। कमरों की दीवारों पर मोटिवेशनल कोट्स नहीं, अधूरे नोट्स और अधूरे सपनों की परछाइयाँ लटक रही हैं। कभी फैन से तो कभी भविष्य से। छात्रों के आत्महत्या के आंकड़ों की कालिख से स्याह हो रहा है इंजीनियरिंग का सपना।

पिछले कुछ सालों से तकनीकी कॉलेजों में पढ़ने वाले बच्चों में मानसिक अवसाद  के कारण आत्महत्या या आत्महत्या की कोशिश करने वालों की जैसे बाढ़ सी आ गई है। खुदकुशी की घटनाओं से पहले मिल रहे सुसाइड नोट्स मौत से पहले की मनःस्थिति और हालातों की कहानी खुद बयां कर रहे हैं। किसी ने जहर खा लिया, कोई फांसी लगाकर  मर गया, कोई बहुमंजिला इमारत से कूद पड़ा, तालाब में डूब मरा तो किसी ने ट्रेन  से कटकर जान दे दी।

रोज-ब-रोज ऐसी मौतों की लंबी होती जाती फेहरिस्त उन लोगों की है, जो जिंदगी की मुश्किलात के सामने हार मान दुनिया को बेवक्त अलविदा कह गए, यह भी न सोचा कि सांसें रहेंगी तो जिंदगी तो फिर गुलजार होने का मौका देगी, वरना मौत की दहलीज के उस पार क्या, किसने देखा। काश… इनसे भी जीवन के लिए कोई संवाद करता, भरोसा देता और कहता… डोंट वरी यार… मैं हूं ना।

लेकिन शायद ऐसा नहीं है इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले हर बच्चों की दुनिया अलग होती है,उनके अपने सपने होते हैं, उनमें एक दूसरे के साथ देने के मौके नहीं के बराबर मिलते हैं।

नालंदा कॉलेज आफ इंजीनियरिंग की छात्रा सोनम की मौत की गुत्थी भले अभी नहीं सुलझी है। लेकिन इसी वर्ष 18 जुलाई को जमुई इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र प्रिंस राज ने अपने प्रिंसिपल डॉ आशीष कुमार की डांट से इतना आहत हुआ कि उसने आत्महत्या का प्रयास किया। लेकिन उसे बचा लिया गया।

प्रिंसिपल पर आरोप था कि उसने प्रिंस को प्रताड़ित ही नहीं किया, बल्कि कॉलेज से निकाल देने की भी धमकी दी थी। यहां भी नालंदा इंजीनियरिंग कॉलेज की तरह छात्रों का ग़ुस्सा भड़क उठा था।

23 मार्च,2025 :  बिहार के शिवहर इंजीनियरिंग कॉलेज की फाइनल ईयर की छात्रा का शव हॉस्टल के कमरे में फंदे से लटका मिला था। यहां पर छात्रा आकांक्षा के परिवार वालों ने कॉलेज के प्रिंसिपल वार्डन पर प्रताड़ित करने का आरोप लगा था।

24 मार्च,2025: गोपालगंज के सिपाया स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज के फाइनल इयर के छात्र मंटू सिंह ने भी कॉलेज प्रशासन से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी।

07 अक्टूबर,2023: लखीसराय जिले के शिवसोना इंजीनियरिंग कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में छात्रा संजना ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। वजह थी बिना किताबों के पढ़ाई हो रही थी जिसमें छात्रों के मार्क्स कम आए थे।

यह महज कुछ गिने-चुने घटनाएं हैं। छात्रों के आत्महत्या के आंकड़े और भी है। लेकिन सवाल है कि बच्चे अपने सुनहरे भविष्य के लिए इन संस्थानों में एडिमशन तो लेते हैं, लेकिन उनके सपनों की अर्थी क्यों निकल रही है? तो मान लें कि राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘3 इडियट’ के डीन डॉ वीरू सहस्त्रबुद्धे यानी वायरस हर कॉलेज में हैं, जो भारतीय शिक्षा प्रणाली के कठोर और पारंपरिक दृष्टिकोण का प्रतीक हैं। उनकी सख्ती छात्रों पर मानसिक दबाव डालती है।

राजकुमार हिरानी की फिल्म ‘3 इडियट’ फ़िल्म में भारतीय शिक्षा प्रणाली की आलोचना की गई है, जो रटने पर आधारित है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार रैंचो का मानना है कि ‘ज्ञान का पीछा करो, सफलता अपने आप तुम्हारे पीछे आएगी’।

वहीं चतुर रामालिंगम का चरित्र ‘अंधाधुंध रटाई’ का है। साथ ही इस फिल्म में जॉय लोबो और पिया (करीना कपूर)के भाई जैसे पात्र बताते हैं कि किस तरह माता-पिता और शिक्षा प्रणाली का दबाव छात्रों को आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर कर सकता है। यह भारतीय समाज में मानसिक स्वास्थ्य और करियर से जुड़े दबाव की ओर इशारा करता है।

फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि शिक्षा का असली उद्देश्य क्या है- केवल डिग्री और नौकरी पाना या असली ज्ञान अर्जित करना? ‘3इडियट्स’ भारतीय शिक्षा प्रणाली और समाज में गहरी जड़ें जमाए रूढ़ियों को चुनौती देने वाली फिल्म है। फिल्म का वहीं सबसे सटीक डायलॉग और एक सवाल कि ‘क्या हम अपने बच्चों को इंसान बना रहे हैं या मशीन?’

इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले हर छात्र एक रैंक नहीं होता। हर बच्चा AIR 1 नहीं हो सकता है। पढ़ाई की जगह डर बेचा जा रहा है। फिर फेल हो होने पर कॉलेज प्रशासन कहता है, ‘उसने तो डिप्रेशन में कर लिया।’ अगर सरकार कहती है, कॉलेज का सिस्टम कहता है कि ‘ये सब निजी मामला है’ तो सोचना होगा, जब एक बच्चा आत्महत्या करता है तो वह सिर्फ अपनी जिंदगी नहीं ख़त्म करता,वो पूरी व्यवस्था पर सवाल लटका देता है।

बिहार के इंजीनियरिंग कॉलेजों को खुद से एक सवाल पूछना होगा  कि ‘तुम पढ़ा क्या रहें हों, फीजिक्स, केमिस्ट्री,  मैथ या डर,तनाव और कुंठा’? भले बच्चे किताबों के पन्ने में उलझा दिया गया है, लेकिन जिंदगी के कोरे पन्नों के लिए कोई स्पेस नहीं छोड़ा।

Expert Media News / Mukesh bhartiy

वरिष्ठ पत्रकार मुकेश भारतीय पिछले 35 वर्षों से एक समर्पित समाचार लेखक, संपादक और संचार विशेषज्ञ के रुप में सक्रीय हैं, जिन्हें समसामयिक राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक मुद्दों और क्षेत्रीय खबरों पर गहरी समझ और विश्लेषण देने का अनुभव है। वे Expert Media News टीम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो एक डिजिटल समाचार प्लेटफ़ॉर्म जो ताज़ा घटनाओं, विश्वसनीय रिपोर्टिंग और प्रासंगिक दृष्टिकोण को पाठकों तक पहुँचाने का लक्ष्य रखता है। Expert Media News न केवल ताज़ा खबरें साझा करता है, बल्कि उन विश्लेषणों को भी प्रकाशित करता है जो आज की बदलती दुनिया को बेहतर ढंग से समझने में मदद करते हैं। वे मानते हैं कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल खबर देना नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी के साथ सामने रखना है। ताकि एक स्वस्थ समाज और स्वच्छ व्यवस्था की परिकल्पना साकार हो सके।

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