ACB का खुलासाः विनय चौबे ने किया 5000 एकड़ जमीन घोटाला, HC ने जमानत ठुकराई
रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। झारखंड में जमीन घोटालों की परतें एक बार फिर खुलती नजर आ रही हैं। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की ताजा जांच में हजारीबाग जिले में करीब 5000 एकड़ सरकारी और संरक्षित जमीन के बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। यह पूरा मामला उस अवधि से जुड़ा बताया जा रहा है, जब विनय चौबे हजारीबाग के उपायुक्त (डीसी) के पद पर कार्यरत थे। इस खुलासे ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि जमीन माफिया और अधिकारियों के गठजोड़ ने किस तरह सरकारी जमीन को निजी सौदों का हिस्सा बना दिया।
एसीबी की जांच में सामने आया है कि जिन जमीनों का अवैध लेन-देन हुआ, उनमें वन भूमि, गैर मजरूआ आम, सरकारी खासमहाल, केसर-ए-हिंद, लखेराज और ट्रस्ट की जमीन शामिल है। यह जानकारी खुद एसीबी की ओर से हाइकोर्ट में विनय चौबे की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान दी गई, जिससे मामले की गंभीरता और बढ़ गई है।
अब तक एसीबी हजारीबाग में जमीन से जुड़े दो बड़े मामलों की जांच कर रही थी। वन भूमि घोटाला और खासमहाल ट्रस्ट भूमि घोटाला। इन दोनों मामलों में जमीन का दायरा कुछ एकड़ तक सीमित माना जा रहा था। लेकिन ताजा जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि वास्तविक घोटाला हजारों एकड़ तक फैला हुआ है, जिसे लंबे समय तक योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।
खासमहाल घोटाले से जुड़े केस डायरी के पारा संख्या 86 में 23 लोगों का उल्लेख है। इनमें से तीन खरीदार मनीष नारायण, प्रीति प्रसाद और नंद रानी सिन्हा के बयान ने पूरे नेटवर्क की पोल खोल दी। इन लोगों ने बताया कि जमीन के पावर ऑफ अटॉर्नी धारकों ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि ऊपर तक मजबूत संपर्क है और जमीन का ट्रांसफर बिना किसी दिक्कत के हो जाएगा।
जांच में यह भी सामने आया है कि जमीन के पावर ऑफ अटॉर्नी धारक विजय प्रताप सिंह और सुधीर प्रताप सिंह के जरिए जमीन खरीदने वाले लोग सीधे तत्कालीन डीसी विनय चौबे से मिले थे। उस दौरान कथित तौर पर उन्हें व्यक्तिगत रूप से यह आश्वासन दिया गया कि लीज उनके नाम पर आसानी से ट्रांसफर कर दी जाएगी। यही भरोसा जमीन सौदों का आधार बना।
गवाहों के बयान के अनुसार, विजय प्रताप सिंह और सुधीर सिंह, विनय चौबे के डीसी रहते हुए नियमित रूप से उनके कार्यालय जाया करते थे। खरीदारों ने यह भी स्वीकार किया कि उन्हें बाद में पता चला कि पावर ऑफ अटॉर्नी फर्जी तरीके से ली गई थी, जिसकी जानकारी जमीन खरीदने से पहले उन्हें नहीं थी।
एसीबी सूत्रों के अनुसार अब यह घोटाला सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसमें प्रशासनिक मिलीभगत, फर्जी दस्तावेज और प्रभाव के दुरुपयोग की गहरी परतें हैं। 5000 एकड़ के इस घोटाले के सामने आने के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में और बड़े नाम जांच के दायरे में आ सकते हैं।
फिलहाल यह मामला झारखंड में अब तक के सबसे बड़े जमीन घोटालों में से एक माना जा रहा है, जिसने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।










