
इस्लामपुर, नालंदा (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज)। विश्व दाल दिवस 2026 के अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के अनुसंधान निदेशालय के तत्वावधान में पल्स अनुसंधान केंद्र, मोकामा में मंगलवार 10 फरवरी को एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य दलहनी फसलों के महत्व, पोषण सुरक्षा, मृदा संरक्षण और किसानों की आय वृद्धि में इनके योगदान को रेखांकित करना रहा। इस वर्ष विश्व दाल दिवस की थीम ‘Pulses of the World: From Modesty to Excellence’ रखी गई, जो दलहनों की साधारण छवि से उत्कृष्टता तक की यात्रा को दर्शाती है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि इस्लामपुर मगही पान अनुसंधान केंद्र सह कृषि अनुसंधान संस्थान, पटना के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. एस. एन. दास ने कहा कि दालें केवल भोजन नहीं, बल्कि भारत की पोषण सुरक्षा की रीढ़ हैं।
उन्होंने बताया कि बढ़ती जनसंख्या और बदलती जीवनशैली के बीच प्रोटीन की मांग तेजी से बढ़ रही है, जिसे पूरा करने में दलहनी फसलों की भूमिका सबसे अहम है। दालें न केवल सस्ती और पौष्टिक हैं, बल्कि वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर कर मृदा की उर्वरता भी बढ़ाती हैं, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है।
डॉ. दास ने वैज्ञानिकों और कृषि विस्तार कर्मियों से आह्वान किया कि वे अनुसंधान प्रयोगशालाओं से निकलकर किसानों के खेत तक तकनीकों को सरल और व्यावहारिक रूप में पहुंचाएं।
उन्होंने किसानों से उन्नत किस्मों, प्रमाणित बीज, संतुलित उर्वरक उपयोग और वैज्ञानिक खेती पद्धतियों को अपनाने की अपील की। साथ ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को देखते हुए सूखा, बाढ़ और रोग प्रतिरोधी दलहनी किस्मों के विकास पर विशेष जोर दिया।
इस अवसर पर बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के निदेशक अनुसंधान डॉ. ए. के. सिंह ने अपने संदेश में कहा कि दलहन उत्पादन को बढ़ावा देना समय की मांग है। विश्वविद्यालय किसानों की जरूरतों के अनुरूप अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और तकनीकी प्रसार के माध्यम से राज्य में दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और स्वागत भाषण से हुआ। पल्स अनुसंधान केंद्र, मोकामा के वैज्ञानिकों ने अतिथियों का स्वागत करते हुए केंद्र की अनुसंधान गतिविधियों, उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं की जानकारी दी। तकनीकी सत्रों में किसानों को दलहनी फसलों की उन्नत किस्मों का चयन, बीज उपचार, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, रोग एवं कीट प्रबंधन, वैज्ञानिक कटाई और भंडारण विधियों पर विस्तार से जानकारी दी गई। इसके साथ ही दलहन आधारित फसल चक्र अपनाने से मृदा स्वास्थ्य सुधार और उत्पादन लागत कम करने के तरीकों पर भी प्रकाश डाला गया।
कार्यशाला के दौरान किसानों और वैज्ञानिकों के बीच संवाद सत्र भी आयोजित हुआ, जिसमें किसानों ने खेती से जुड़ी अपनी समस्याएं, अनुभव और सुझाव साझा किए। वैज्ञानिकों ने व्यावहारिक समाधान बताते हुए आधुनिक तकनीकों को अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया।
पल्स अनुसंधान केंद्र, मोकामा के प्रभारी पदाधिकारी डॉ. वी. बी. झा ने बताया कि केंद्र द्वारा अरहर, मूंग, उड़द, चना सहित विभिन्न दलहनी फसलों की उच्च उत्पादक और उन्नत किस्मों के विकास, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और किसानों के प्रशिक्षण पर लगातार कार्य किया जा रहा है। केंद्र का प्रयास है कि वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से किसानों की लागत घटे और आय बढ़े।
कार्यक्रम में डॉ. रमेश कुमार (कृषि सेवा प्रबंधक, इफको, बिहार), डॉ. रीता सिंह (कृषि विज्ञान केंद्र, बाढ़), डॉ. निखत आजमी (कृषि अनुसंधान संस्थान, पटना), डॉ. उमेश नारायण (कृषि विज्ञान केंद्र, नालंदा) और राजीव लोचन (सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक, इफको, बिहार) सहित कई गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।
इ मोके पर बड़ी संख्या में वैज्ञानिक, कर्मचारी, प्रगतिशील किसान और कृषि क्षेत्र से जुड़े हितधारकों की सहभागिता ने कार्यक्रम को सार्थक बनाया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यशाला का समापन हुआ।
समाचार स्रोत: एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क के लिए इस्लामपुर, नालंदा से रामकुमार वर्मा की रिपोर्ट





