कृषि बिल यानि अब किसानों पर उद्योगपतियों की कानूनन हकमारी !

यह विधेयक धीरे-धीरे एपीएमसी (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटी) यानी आम भाषा में कहें तो मंडियों को ख़त्म कर देगा और फिर निजी कंपनियों को बढ़ावा देगा जिससे किसानों को उनकी फ़सल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा...

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क।  केंद्र सरकार की ओर से कृषि सुधार बिल कहे जा रहे तीन में से दो विधेयक ध्वनि मत से पारित होने के बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अंतिम मुहर लगते ही यह क़ानून बन जाएगा।

इन विधेयकों के ख़िलाफ़ हरियाणा-पंजाब के किसान कई बार प्रदर्शन कर चुके हैं और इसको लेकर किसानों की अलग-अलग आशंकाएं हैं।

हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार यह बात कह चुके हैं कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त नहीं कर रही है और न ही सरकारी ख़रीद को बंद कर रही है।

वहीं, इन विधेयकों को लेकर विपक्ष केंद्र की मोदी सरकार पर हमलावर है और इसके कारण एनडीए के सबसे पुराने साथी अकाली दल ने सरकार में अपने मंत्री पद को भी त्याग दिया है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनकी पार्टी लगातार इस बिल का विरोध करती आई है। राहुल गांधी ने यह भी ट्वीट किया कि प्रधानमंत्री मोदी किसानों को पूंजीपतियों का ‘ग़ुलाम’ बना रहे हैं।

पहला बिल कृषक उपज व्‍यापार और वाणिज्‍य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020 है जो एक ऐसा क़ानून होगा जिसके तहत किसानों और व्यापारियों को एपीएमसी की मंडी से बाहर फ़सल बेचने की आज़ादी होगी।

सरकार का कहना है कि वह एपीएमसी मंडियां बंद नहीं कर रही है बल्कि किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था कर रही है जिसमें वह निजी ख़रीदार को अच्छे दामों में अपनी फ़सल बेच सके।

दूसरा बिल कृषक (सशक्‍तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्‍वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020 है। यह क़ानून कृषि क़रारों पर राष्ट्रीय फ़्रेमवर्क के लिए है।

ये कृषि उत्‍पादों की बिक्री, फ़ार्म सेवाओं, कृषि बिज़नेस फ़र्मों, प्रोसेसर्स, थोक विक्रेताओं, बड़े खुदरा विक्रेताओं और निर्यातकों के साथ किसानों को जुड़ने के लिए सशक्‍त करता है।

आसान शब्दों में कहें तो कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग में किसानों के आने के लिए यह एक ढांचा मुहैया कराएगा।

वेशक मोदी सरकार ने जो भी क़ानून में कहा है, वैसा तो पहले भी होता रहा है, कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग और अपनी फ़सलों को बाहर बेचने जैसी चीज़ें पहले भी होती रही हैं और यह बिल सिर्फ़ ‘अंबानी-अडानी’ जैसे व्यापारियों को लाभ देने के लिए लाया गया है।

लेकिन किसान अब कॉन्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग करता है तो कोई विवाद होने पर वह सिर्फ़ एसडीएम के पास जा सकता है, जबकि पहले वह कोर्ट जा सकता था। इस तरह की पाबंदी क्यों लगाई गई। जाहिर है कि सरकार किसानों को बांध रही है और कॉर्पोरेट कंपनियों को खुला छोड़ रही है। उन्हें अब किसी फ़सल की ख़रीद के लिए कोई लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है।

याद रहे कि बिहार में वर्ष 2006 में एपीएमसी एक्ट को ख़त्म कर दिया गया था। इससे अनुमान लगाया गया था कि किसानों को राज्य में अपनी फ़सल अपने मनपंसद दामों में बेचने में मदद मिलेगी।

अगर यहां किसानों को लेकर बाज़ार की हालत ठीक होती तो अभी तक बिहार के हालात क्यों नहीं सुधरे हैं, यहां पर प्राइवेट मंडियां, निवेश आदि की बात कही गई थी, लेकिन हर साल वहां के किसान अपनी फ़सल लाकर पंजाब-हरियाणा में बेचते हैं।

वहीं  पंजाब में सबसे बड़ा मंडियों का नेटवर्क है। वहां पर जो बासमती चावल के निर्यातक हैं वे यह अब कह रहे हैं कि जब तक मंडियों का 4।50 फ़ीसदी टैक्स हटा नहीं दिया जाता तब तक वे सामान बाहर से ख़रीदेंगे, क्योंकि बाहर कोई टैक्स नहीं है। इसी तरह कपास और दूसरे सामान के निर्यातक कह चुके हैं कि वे मंडी से सामान नहीं ख़रीदेंगे। मंडी से टैक्स नहीं आएगा तो सरकार को कमाई नहीं होगी और कमाई नहीं होगी तो मंडियों का रखरखाव बंद हो जाएगा।

दरअसल, प्राइवेट सेक्टर यही चाहता है कि जब मंडियां समाप्त हो जाए तो उसकी पकड़ मज़बूत हो जाए, किसानों का डर भी यही है। जब मंडियां ख़त्म हो जाएंगी तो एमएसपी भी ख़त्म हो जाएगी।

भारत में किसानों की हालत किसी से छिपी हुई नहीं है। वे बेहद मुश्किल परिस्थितियों में खेती करते हैं और फिर उनको सही मूल्य भी नहीं मिल पाता है।

2015-16 में हुई कृषि गणना के अनुसार देश के 86 फ़ीसदी किसानों के पास छोटी जोत की ज़मीन है या यह वे किसान हैं जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम ज़मीन है।

प्राइवेट प्लेयर्स को कृषि क्षेत्र में लाने की योजना जब अमरीका और यूरोप में फ़ेल हो गई तो भारत में कैसे सफल होगी, वहां के किसान तब भी संकट में हैं जबकि सरकार उन्हें सब्सिडी भी देती है।

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