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    मूर्ख, मूर्खानन्द, मूर्खाधिपति

    मूर्खता एक आभूषण है। और जैसे लोग शौक से सोना, चांदी, प्लेटिनम आदि धातुओं के आभूषण स्वयं से पहनते हैं वैसे ही हमारे देश के कई राजनेता मूर्खता को स्वयं धारण करते हैं। ये स्वयंसेवक जितनी अधिक मात्रा में मूर्खता के आभूषण को धारण करते हैं उतनी ही अधिक उन्नति को हासिल करते हैं।

    मूर्खों की संख्या भारत में कई करोड़ है। इन मूर्खों में जो अधिक श्रेष्ठ होते हैं वे मूर्खानन्द के स्तर या पदवी तक पहुंच जाते हैं। मूर्खानन्द, मूर्खों की क्रीम है। मूर्खों को मथने से मूर्खानन्द नाम की क्रीम सामने आती है।

    इसी तरह मूर्खानन्दों को मथा जाता है तो मूर्खाधिपति सामने आता है। मूर्खाधिपति मूर्खों में सर्वश्रेष्ठ होता है। लाखों में एक तर्ज पर कह सकते हैं कि करोड़ों में एक होता है। क्योंकि वह करोड़ों में एक होता है, इसीलिए ही वह मूर्खों का अधिपति बन जाता है।

    और खास बात यह भी होती है कि मूर्ख नेता अधिक से अधिक ब्लॉक, जिले के स्तर पर ही पहुंच पाते हैं। श्रेष्ठ मूर्ख प्रांत स्तर का दायित्व संभाल लेते हैं परन्तु उसके आगे का रास्ता बहुत ही कठिन होता है।

    मूर्खाधिपति बनने का अवसर उसे ही मिलता है जो मूर्खों के राष्ट्रीय संघ के स्थायी प्रमुख द्वारा चयनित किया जाता है। स्थायी प्रमुख जी भर जीवन भर मूर्खता करने के बाद अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है।

    और ये ही और मूर्खों का राष्ट्रीय संघ ही तय करता है कि कौन मूर्खानन्द और कौन मूर्खाधिपति बनेगा। कौन-कौन, कब-कब, कहां-कहां तक पहुंचेगा। ये स्थायी प्रमुख और उनके नेतृत्व में चलने वाला संघ ही तय करता है। वह ही मूर्ख, मूर्खानन्दों, मूर्खाधिपति को शिक्षा-दीक्षा देता है।

    मूर्ख अधिक से अधिक इस किस्म की बात कर सकते हैं कि ‘गौ मूत्र से कोरोना का इलाज हो सकता है’ या ‘गांधी की तस्वीर से खादी का फायदा नहीं हो सकता और उनकी तस्वीर से मुद्रा का अवमूल्यन हो जाता है। या कोई विपक्ष की किसी वृद्ध स्त्री नेता के बारे में कह सकता है कि कोई क्यों बुढ़िया से सम्पर्क साधेगा’।

    मूर्खानन्द मूर्खों से क्योंकि श्रेष्ठ होते हैं इसलिए वे प्रांत स्तर का दायित्व संभालते हैं। मूर्खता में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए कोई कहता है कि ‘भारत अमेरिका का दो सौ साल गुलाम रहा है तो कोई कहता है कि ज्योतिष शास्त्र सबसे बड़ा विज्ञान है।

    कोई कहता है कि गाय ही एक मात्र ऐसी जीव है, जो अपनी सांस से ऑक्सीजन छोड़ती है। कोई, कोई तो मूर्खाधिपति बनने की आकांक्षा पालने वाला मूर्खानन्द यह तक कह गया कि अगर महिलाएं बलात्कार का विरोध नहीं कर सकती हैं तो उसका आनन्द लें।

    मूर्खाधिपति बनने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। कहना पड़ता है कि तक्षशिला बिहार में था। कहना पड़ता है कि भूटान की राजधानी काठमाण्डू है। कहना पड़ता है कि जैनेटिक विज्ञान भारत में अतीत में था इसलिए एक घडे़ के रक्त से सौ कौरव पैदा हुए।

    या कि कहना पड़ता है कि यदि महाभारत का महायौद्धा कर्ण मां के गर्भ से नहीं पैदा हुआ तो यह प्रमाण है कि भारत में अतीत में ऐसा जेनेटिक विज्ञान था जो किसी का जन्म मां के गर्भ से बाहर ही कर देता था।

    या फिर कहना पड़ता है कि हम भगवान गणेश की पूजा करते हैं और निश्चित रूप से उस समय किसी किस्म की प्लास्टिक सर्जरी थी जिस कारण एक हाथी के सिर को इंसान के शरीर में जोड़ दिया गया।

    मूर्ख, मूर्खानन्द और मूर्खाधिपति की प्रतिभा, कला और जीवटता में कोटी-कोटी का फर्क होता है। इसलिए मूर्खाधिपति के लिए मूर्खानन्द कहते हैं कि वे भारत को ईश्वर द्वारा दिये गये उपहार हैं।

    और कोई मूर्खानन्द कहता है कि जैसे राम और कृष्ण की पूजा होती है वैसे वे भी भविष्य में पूजे जायेंगे। कोई मूर्खानन्द कहता है कि वे विष्णु का कलियुग में अवतार हैं। मूर्खाधिपति की ऐसी प्रशंसा मूर्खानन्दों और मूर्खों को बहुत भाती है।

    और सबसे बढ़कर मूर्खाधिपति ऐसी प्रशंसा के आधार पर उनकी उन्नति के द्वार को खोल देता है। मूर्खाधिपति क्योंकि मूर्खता की एक से बढ़कर एक नई-नई मिसाल कायम करता है इसलिए बहुत मेहनत करने के बाद भी कोई मूर्खाधिपति के पद तक नहीं पहुंच पाता है। और अपनी बारी में मूर्खानन्द भी ऐसा ही करते हैं।

    और जब कभी मूर्खानन्द से उनकी पदवी छीन ली जाती है तो वह कह उठता है कि अभिमन्यु को धोखे से मार दिया गया था। पदवी छीन लेने के बाद मूर्खानन्द को बुद्धिमानी का दौरा पड़ने लगता है। और ऐसा दौरा मूर्खों को भी पड़ सकता है, जब वे देखेंगे मूर्खाधिपति अब अधिपति नहीं रह गये हैं।

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