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Friday, September 24, 2021
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    कोर्ट ने नालंदा पुलिस-प्रशासन के इस फर्जीबाड़ा की हवा निकाल दी, कार्रवाई करे सरकार

    एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क हमेशा यह उजागर करती रही है कि नालंदा पुलिस के नुमांइदे फर्जी मुकदमा गढ़ते रहे हैं और प्रशासन उसे बल देते रही है।

    नालंदा थाना क्षेत्र के मोहनपुर गांव में एक गेस्ट हाउस में कोरोना संदिग्धों को रखे जाने और उसकी उच्श्रृंखलता का जब स्थानीय लोगों ने विरोध किया तो प्रशासन के एक एक वरीय अधिकारी ने उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया।

    इसे लेकर जब विवाद हुआ तो कोई भी उसका हल निकालने के बजाय भारी संख्या में पुलिस बल बुलाकर ग्रामीणों के घरों में घुसकर जमकर उत्पात मचाई गई।

    सिलाव बीडीओ के द्वारा नालंदा थाना में दर्ज प्राथमिकी में ग्रामीणों पर गंभीर आरोप लगाए गए। मीडिया में भी इस हवाबाजी को बल दिया गया कि एसडीओ पर जानलेवा हमला किया गया।

    लेकिन इस बात के कोई प्रमाण सामने नहीं आए कि पुलिस-प्रशासन पर हमला किया गया। अगर 100 से अधिक लोगों द्वारा रोड़ेबाजी-हमला किया गया होता तो निश्चित तौर पर किसी न किसी को चोंटे अवश्य आती।

    हालांकि विरोध को दबाने के लिए पुलिस जब बल प्रयोग करने लगी तो भीड़ से दो-चार असमाजिक तत्वों ने शासन टीम की ओर रोड़े फेंके। लेकिन वे इतने अराजक नहीं थे कि अचानक भारी पुलिस बल बुला ग्रामीणों के घरों में घुसकर बर्बरता का परिचय दिया जाए। यहां प्रशासन की दोयम दर्जे की मानसिकता ही अधिक जिम्मेवार है।

    खबर है कि नालंदा गेस्ट हाउस में कोरोटाइन सेंटर बनाने का विरोध और कथित रोड़ेबाजी के मामले में पुलिस ने जार लोगों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया। लेकिन कोर्ट ने पुलिस के दावे की हवा निकाल दी और उन्हें पीआर बांड पर जमानत दे दी।

    कोर्ट ने स्पष्ट माना कि गिरफ्तार किये गये लोग रोड़ेबाजी नहीं कर सकते हैं। पुलिस ने चारों को रिमांड पर लेने के लिए गुरुवार को कोर्ट में पेश किया। मामले की सुनवाई सीजेएम संतोष कुमार गुप्ता की अदालत में हुई। चारों आरोपितों ने अपने उपर लगाये गये आरोपों से इन्कार किया।

    न्यायाधीश ने कहा कि चारों आरोपितों की उम्र अधिक है। उनकी सेहत ऐसी नहीं है कि रोड़ेबाजी और हंगामा कर सके। हां, उनलोगों ने आबादी के बीच क्वारंटीन सेंटर का स्थान बदलने की मांग की थी। चारों आरोपितों को जमानत दे दी गयी।

    आखिर सुशासन के नुमाइंदे सीएम के गृह जिले में खुद अराजकता फैला साबित क्या करना चाहते हैं। क्या घनी आबादी के बीच कोरोटाइन सेंटर बनाने के साथ लोगों को विश्वास में लिया गया। आस-पास के घरों में आवश्यक रसायन का छिड़काव किया गया। नहीं। प्रशासन ने कोई ऐसी सतर्कता नहीं दिखाई?

    अहम सबाल यह भी है कि जिन गंभीर क्षेत्रों से लोगों को कोरोटाइन के लिए लाया गया, यदि उसमें कोई खुदा न खास्ता कोरोना पोजेटिव निकल आए तो उसका खामियाजा आसपास के लोग क्यों भुगते, जब कोई शासनिक इंतजाम नजर नहीं आता हो।

    सबसे बड़ी बात कि प्रशासन ने नालंदा थाना में दर्ज प्राथमिकी में ग्रामीणों पर जातीय-सांप्रादायिक माहौल बिगाड़ने का आरोप भी लगाया है।

    ऐसे में थानेदार के साथ हमेशा विवादों में घिरे एसडीओ-डीएसपी को बताना चाहिए कि कोरोटाइन सेंटर का विरोध से उक्त सदभाव कैसे बिगड़ सकता है?

    आश्चर्य की बात है कि जब पुलिस लोगों के घरों में घुसकर बेरहमी से पिटाई कर रही थी, उस वक्त डीएसपी सोमनाथ प्रसाद और एसडीओ संजय कुमार खुद मौजूद थे। एसडीओ ने तो मास्क तक नहीं लगाया था। उस दौरान शासन का कोई कर्मी खुद लॉकडाउन के नियम का पालन नहीं कर रहा था।

    दरअसल, यहां अनुभवहीन सत्ता संरक्षित पैरवी पुत्र अफसरों की भरमार है। वे यह भी नहीं समझ पाते कि वे क्या कर रहे हैं और भविष्य में इसकी परिणति क्या होगी।

    जाहिर है कि नाकाबिल अफसरों को तुरंत हटाकर ऐसे अफसरों को तैनात किया जाना चाहिए, जो हर परिस्थिति को संभालने में सक्षम हों। चूकि नालंदा भी राज्य के कोरोना संक्रमित जिला के रुप में तेजी से उभर रहा है। सरकार को इस दिशा में तत्काल कदम उठाने  चाहिए।

    ?नीचे देखिए अंत तक एक घर में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद वह वीडियो….जो पुलिस-प्रशासन की उदंडता की यूं ही पोल खोल जाती है….?

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