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Sunday, September 26, 2021
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    आखिर क्या होता है टिस्को आदित्यपुर कंपलेक्स कॉलोनी में कि पत्रकारों को घुसने पर रोक लगा दी गई!

    सरायकेला (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क / चंद्रमणि वैद्य)। सरायकेला जिले में स्थित टाटा स्टील ग्रोथ शॉप के आवासीय परिसर में पत्रकारों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। इस कॉलोनी में घुसने के लिए पत्रकारों को प्रबंधन का आदेश लेना अनिवार्य होगा। वहीं, कपनी के आवासीय कॉलोनी के मुख्य गेट पर तैनीत सुरक्षा कर्मी ने इस संबंध में कुछ भी बताने से इंकार कर दिया।

    वैसे पूरा मामला उस वक्त प्रकाश में आया, जब जिले का एक पत्रकार  किसी समाचार के संकलन हेतु कंपनी के आवासीय परिसर में प्रवेश कर रहा था। जहां मुख्य गेट पर ही उन्हें रोक दिया गया। मौके पर SIS सिक्योरिटी के जवान खड़े थे, जिन्होंने स्पष्ट कर दिया कि आप कुछ भी हो कितने भी बड़े पत्रकार हो, हम बिना टाटा स्टील के आदेश के अंदर नहीं जाने देंगे।

    वैसे थोड़ी ही देर बाद टाटा स्टील ग्रोथ शॉप सिक्योरिटी के इंस्पेक्टर इंचार्ज हरजीत सिंह भी मौके पर पहुंचे। वहीं पत्रकार द्वारा  कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन के प्रमुख कुलवीन सूरी और कोल्हान के आयुक्त वीरेंद्र भूषण को भी फोन लगाया गया, लेकिन ढाक के तीन पात। सभी का यही कहना था कि आप नहीं घुस सकते।

    अब सवाल ये  उठता है कि कंपनी के आवासीय परिसर में ऐसा कौन सा कृत्य होता है,  जहां पत्रकारों को छोड़कर तमाम लोग आ जा सकते हैं।

    इन सब सवालों का जवाब जब पत्रकार ने टाटा स्टील ग्रोथ शॉप के सिक्योरिटी इंस्पेक्टर इंचार्ज हरजीत सिंह से जानना चाहा तो कैमरे पर कुछ भी कहने से उन्होंने साफ मना कर दिया और पत्रकार के लिए दरवाजे बंद कर दिए गए। वैसे सूत्रों की अगर मानें तो कंपनी के आवासीय परिसर में लॉकडाउन के नियमों का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन होता है।

    सूत्र यह भी बताते हैं कि जिस तरह सोची समझी रणनीति बनाकर एक अच्छी खासी चलती हुई इतने पुराने कंपनी टायो को जिस तरह से टाटा स्टील ने दूध की मक्खी के जैसे निकालकर फेंक दिया, ठीक उसी तरह से बिना किसी को भनक लगे उन तमाम लोगों पर उनकी प्रताड़ना बढ़ गई है, जो उनके कर्मचारी थे। वे लोग अपने हक के लिए आज भी टायो कॉलोनी परिसर के अंदर अपने-अपने फ्लैटों में रह रहे हैं।

    वहां उनके घरों की बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिया गया है। उन्हें ऐसी प्रताड़ना दी जा रही है, जो कि मौत से भी भयंकर है। लेकिन इन तमाम चीजों को जाहिर करने की हैसियत रखने वाला पत्रकार अब प्रबंधन और प्रशासन के खेल मे पिसा जा रहा है, क्योंकि उन तमाम चीजों को कोई भी ना ही अपने अखबार में प्रकाशित कर पाएगा और न ही कोई चैनल दिखा पाएगा।

    कल्पना कीजिए कि जब टायो कंपनी चालू थी तो किसी न किसी का नया विवाह होने के कुछ ही दिनों के बाद कंपनी बंद हो गई होगी। परिस्थिति की मार से नवयुवक की मृत्यु हो गई हो, अब वह बेचारी कम उम्र की बेवा किसके सहारे जिए।

    अगर दो कमरे फ्लैट को छोड़कर बाहर निकलती है और अपनी पीड़ा अपनी वेदना किसी के सामने प्रकट करने की कोशिश करते हैं तो आप यह भूल जाएं कि वापस वह उस परिसर में कदम भी नहीं रख पाएगी। अरे भाई जब पत्रकार उस परिसर में नहीं घुस सकते। आयुक्त और उपायुक्त की नहीं चल सकती तो भला क्या बिगाड़ लेगी।

    पूर्व में इसी टाटा स्टील के सिक्योरिटी गार्ड ने कंप्लेन करके दूध मूहे बच्चे की माताओं पर बहनों पर भूख से बिलखते परिवारों पर गंदे पानी का छिड़काव कर उन्हें लाठियों और डंडों से पिटवाया था। कहीं उन तमाम लोगों को परिसर के अंदर ही मृत्युदंड तो नहीं दे दिया गया? उनकी लाश को ठिकाने तो नहीं लगाया जा रहा है?

    आखिर ऐसा क्या है कि सिर्फ और सिर्फ पत्रकारों पर ही प्रतिबंध लगा है? जहां एक ओर गृह मंत्रालय ने अपने अधिकारीक पत्र के द्वारा यह स्पष्ट कर दिया कि समाचार संकलन कभी भी किसी भी प्रकार से नहीं रोका जाना चाहिए तो फिर गृह मंत्रालय के आदेशों की अवहेलना की जा रही है?

    यदि गृह मंत्रालय से ऊंचा टाटा कंपनी का प्रबंधन है तो फिर क्यों लोग प्रधानमंत्री के लिए मतदान करते हैं। हमारे पास बहुत सारे अधिकार क्यों मौजूद हैं और अगर मौजूद हैं भी तो यहां आकर सारे अधिकार क्यों शून्य की मुद्रा में चले जाते हैं। मेरी बातों पर जरूर विचार करें। क्यों डरता है टाटा स्टील ?

    वैसे यह घटनाक्रम न केवल एक पत्रकार के अधिकारों का हनन करता है, बल्कि कोरोना संक्रमण के दौरान मीडियाकर्मियों को मिले अधिकारों का भी दोहन करता है। प्रशासन को ऐसे मामलों की सख्ती से जांच करनी चाहिए।

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