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Saturday, September 25, 2021
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    लघु समाचार पत्रों का योगदान एवं चुनौतियां

    मनुष्य एक सामाजिक प्राणी होने के नाते एक-दूसरे से मिल-जुल कर रहना पसंद करता है तथा आस-पास क्या हो रहा है के जानने की जिज्ञासा रखता है। मनुष्य की इस इच्छा पूर्ति का काम करते हैं समाचार पत्र व मिडिया जिसे प्रजातन्त्र का चौथा स्तम्भ भी कहते हैं।

    प्राचीनकाल में समाचार जानने के साधन बहुत कम व स्थूल थे। लेकिन जैसे – जैसे मनुष्य बौधिक व  आर्थिक विकास होता गया, उनमें समाचार पत्रों की जिज्ञासा बढ़ती गई। यही नहीं, इतिहास गवाह है इस बात का कि समाचार पत्रों ने धर्म व राजनीतिक तथा सामाजिक चेतना लाने मे बहुत बड़ा योगदान दिया है।

    सम्राट अशोक ने बौध धर्म के सिद्धांतों को दूर-दूर तक पहुंचाने के लिए लाटें बनवाईं। साधु महात्मा चलते-चलते समाचार पहुंचाने का कार्य करते थे। छापेखाने के अविष्कार के साथ ही समाचार-पत्रों की जन्म कथा का प्रसंग आता है।

    मुगलकाल में ‘‘अखबारात-इ-मुअल्ल’’ के नाम से समाचार पत्र चलता था। अंग्रेजों के आगमन से समाचार पत्रों का विकास हुआ। सबसे पहले 20 जनवरी, 1780 ई0 में बारे हेस्टिंगज ने‘इंडियन गजट’ नामक समाचर पत्र निकाला। इसके उपरान्त ईसाई धर्म के प्रचारकों ने ‘समाज दर्पण’ नामक अखबार प्रारंभ किया।

    राजाराम मोहनराय ने सती प्रथा के विरोध में ‘‘कौमुदी’’ तथा ‘‘चंद्रिका’’ नामक समाचार पत्र चलाये। हिंदी के साहित्यकारों ने भी समाचार पत्रों के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होनें भारतीय जीवन में चेतना का शंखनाद किया। लोकमान्य तिलक द्वारा संचालित ‘केसरी’ समाचार पत्र तो क्रांति का घोतक बन गया।

    समय के अनुसार समाचार पत्रों के आकार व प्रसार बदलते आये हैं। प्रसार व क्षेत्र के आधार पर समाचार पत्रों में राष्ट्रिय, राज्य स्तरीय व लघु समाचार पत्र मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। जब यातायात के साधन सीमित थे तब तक लघु समाचार पत्रों का बोलवाला था तथा वे स्थानीय स्तर पर अपना अहम स्थान रखते थे।

    परन्तु आर्थिक विकास के चलते यातायात व संचार के साधन विकसित हुये जिसके फलस्वरूप जो लघु समाचार पत्र माने जाते थे, राष्ट्रिय व राज्यस्तरीय समाचार पत्र बन गये। परन्तु राष्ट्रिय समाचार पत्रों ने लघु समाचर पत्रों को एक किनारे में धकेलने का कार्य किया जिससे लघु समाचार पत्रों के सामने अपने अस्तित्व की एक बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई।

    आज लघु समाचार पत्र जहां स्थानीय स्तर पर लोगों के बीच चेतना जगाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं वहीं उनको अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आर्थिकी मोर्चे पर जुझना पड़ रहा है।

    व्यापार व शिक्षा के प्रसार के चलते विज्ञापनों का बाजार खुल गया जिस पर बड़े-बड़े समाचार पत्रों ने अपना एकाधिकार जमा लिया तथा लघु समाचार पत्र इस क्षेत्र में एक हासिये पर चले गये जो कि प्रजातन्त्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

    आज लघु समाचार पत्र केवल वही चला पा रहे हैं जिन के पास आय का अन्य कोई साधन मौजूद हैं अन्यथा इन्हें चलाना एक बड़ी चुनौती बन गई है।

    समाचार पत्र चलाने के लिए विभिन्न स्थानों पर पत्रकारो की आविष्कार होती है व अच्छे पत्रकारों को लेने के लिए धन की आविष्कार होती है। परन्तु बड़े समाचार पत्रों ने इस क्षेत्र में भी लघु समाचार पत्रो की पछाड़ दिया है। बड़े समाचा पत्र अपने बड़े नाम के चलते ऐसे पत्रकार भर्ती करते हैं जो उल्टा समाचार पत्र के मालिक को विज्ञापनों के माध्य से पैसा कमा कर देते हैं जिससे समाचारों की विश्वसनीयता पर बट्टा लग गया है।

    आज जो भी समाचार किसी ने बड़े-बड़े शब्दों में छपवाना है तो पत्रकार के आगे पैसा फैंको या विज्ञापन दे दो आप का समाचार मुख्य समाचार के रूप में अगले दिन की अखबार में देखने को मिलेगा। जिसे आज की वर्तमान भाषा में ‘पेड न्यूज’ कहा जाता है।

    लघु समाचार पत्रों को डुबोने के मकसद से बड़े समाचार पत्रों ने अब जिलावार दैनिक समाचारों को अलग पृष्ठों पर छापना शुरू कर दिया है जो कि लघु समाचार पत्रों के लिए आत्महत्या के समान है।

    लघु समाचार पत्रों का हासिये पर चले जाने का दूसरा पहलू ये भी है कि प्रदेश में जब भी कोई बड़ा महोत्सव या उत्सव आता है तो हर गली से कुकरमुत्ते की तरह अपना उल्लू सीधा करने के लिए बहुत बेतुके लघु समाचार पत्र छपते हैं, जिनको पूरे साल बाजार में देखा तक नहीं होता और न ही उनका नाम सुना होता है।

    लेकिन दशहरा, शिवरात्रि आदि महोत्सव में जैसे लघु समाचार पत्रों की बहार सी आ जाती है। इन महोत्सव के खत्म होने के उपरान्त ही ये लघु समाचार पत्र पर लुप्त हो जाते हैं। जिसके कारण जनता का भी थोड़ा विश्वास डगमगाने लगता है। इस प्रकार के बरसाती मेंढ़क भी लघु समाचार पत्रों की शाख हो हानि पहुंचा रहे हैं।

    इतना कुछ होने के बाबजूद भी कुछ लघु समाचार पत्र जमीन पर अपने मजबूत पकड़ बनाये हुये हैं जैसे सुलनी समाचार सोलन ने कर दिखाया है। सरकारी स्तर पर गिरिराज भी अच्छा रोल अदा कर रही हैं परन्तु उनकी सबसे बड़ी कमी यह है कि वे केवल सरकार के गुनगान करने वाले समाचारों व लेखों को ही जगह देते हैं जो कि समाचार पत्र की गरिमा के विपरीत है।

    देश के हर जिला में कोई न कोई स्थानीय समाचार पत्र व पत्रिका प्रकाशित होता है जिनमें अपेक्षाकृत जीवनोपयोगी अनेक विषयों की विस्तार से चर्चा रहती है। जिनमें से सुलनी समाचार भी एक है।

    अच्छा व सच्चा समाचार पत्र वह है जो निष्पक्ष होकर समाज व राष्ट्र के प्रति अपना दायित्व निभाये। वह जनता के हित को सामने रख कर लोगों का वास्तविकता का ज्ञान करवाये। वह सच्चे न्यायाधीष  के समान कार्य करे तथा उसमें हंस का सा विवेक हो जो दूध को एक तरफ तथा पानी को दूसरी तरफ कर दें।

    दुःख की बात तो यह है कि आज पैसे के लालच में अपने ही देश का षोशण किया जा रहा है और जो ऐसा करने में बाधक बनता है उनका गला सत्ताधारी व कट्टपंथी उस तरह घोंट देते हैं जैसे हाल ही में महाराष्ट्र में एक निडर पत्रकार व इतिहासकार को गोली मार कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दी गई।

    लेकिन लघु समाचार पत्र चलाने वालों को यह मान कर चलना होगा कि उनकी डगर कांटों भरी है पर अपनी कलम से किस प्रकार इस डगर पर फूल उगाते हैं, यही आप की परीक्षा की घड़ी होगी जिसमें आप को पास होना होगा तभी सफलता का सूरज नजर आयेगा।

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