जख्मी की हालत गंभीर, मेडिका में भर्ती, एसडीपीओ ने की मामले की जांच

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रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क नेटवर्क)। झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिला के आरआईटी थाना अंतर्गत पिछले शुक्रवार को दो पड़ोसियों के बीच हुए खूनी संघर्ष में हर घंटे नया मोड़ आने से मामला बेहद ही रोचक और पेचीदा हो चला है।

वैसे हम पूरे मामले पर पैनी निगाह रखते हुए पल-पल की घटनाक्रम से अपने पाठकों को अवगत करा रही है और यही कारण है कि मामला अब थाना से आगे बढ़ कर एसडीपीओ के हाथों में चला गया है। जहां अब सबकी निगाहें एसडीपीओ राकेश रंजन के रिपोर्ट पर टिकी है।

वैसे एक्सपर्ट मीडिया न्यूज़ नेटवर्क की खबर पर संज्ञान लेते हुए कोडरमा के मानवाधिकार कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को घटनाक्रम से जुड़े साक्ष्यों के साथ पत्र लिख अवगत कराया है।

इधर देर शाम सरायकेला एसडीपीओ आरआईटी एवं आदित्यपुर थाना प्रभारी के साथ घटनास्थल पर पहुंचे। जहां उन्होंने राय और दुबे परिवार के अलावा पड़ोसियों से भी पूछताछ कर सभी का बयान कलमबद्ध किया है।

हालांकि इसका खुलासा अभी उनके द्वारा नहीं किया गया है। वही हिंसक झड़प में घायल हुए परमानंद राय को सर में गंभीर चोटें आने के बाद सिटी स्कैन कराने की सलाह डॉक्टरों ने दी थी।

उससे पता चला कि उनके सर में ब्लड क्लॉट कर गया है। जिसके बाद परिवार वालों ने उन्हें जमशेदपुर के बिष्टुपुर स्थित मेडिका अस्पताल में भर्ती कराया है। जहां उनकी स्थिति गंभीर बनी हुई है। ऐसे में सरायकेला पुलिस के लिए मुश्किलें बढ़ सकती है।

कहते हैं कि कानून सबके लिए समान होता है लेकिन जिस तरह से इस पूरे प्रकरण में कानून और पहुंच के साथ पैसों का सहारा लेकर आरोपी खुलेआम चैन की सांस ले रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ हिंसक झड़प में गंभीर रूप से घायल हुआ परिवार इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहा है। जहां परिवार का मुखिया ही जिंदगी और मौत के मुहाने पर चला गया है।

वैसे जिस तरह से इस पूरे घटनाक्रम में को नाटकीय मोड़ दिया गया, उससे पुलिस की कार्यशैली सवालों के घेरे में आ गई है। जिस तरह से घटना के दिन परमानंद राय का पूरा परिवार लहूलुहान अवस्था में थाना पहुंचा था।

उस दिन आरआईटी थाना पुलिस के पदाधिकारियों ने मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर पीड़ित परिवार का इंज्युरी काट आखिर किसके सहारे मेडिकल कराने के लिए लॉकडाउन के बीच भेज दिया। 

पीड़ित परिवार जब थाना पहुंचा तो उनकी अवस्था देखकर क्यों नहीं तत्काल पुलिस द्वारा आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित की गई और उनका भी मेडिकल चेकअप करवाया गया।

एक सवाल और जब पूरा परिवार लहूलुहान था, तो उसके लिए पीड़ितों द्वारा लिखा गया आवेदन ही मान्य कैसे हो गया?  क्या पुलिस की नजर लहूलुहान परिवार पर नहीं पड़ी ! क्या वह संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर सकती थी।

चलिए थोड़ी देर के लिए मान लिया जाए कि गलती दोनों ही परिवार के तरफ से हुई है, लेकिन लहूलुहान अवस्था में पहले थाना कौन पहुंचा उसे देखते हुए नियम सम्मत धाराएं क्यों नहीं लगाई गई ?

अगले दिन मुख्यमंत्री को ट्वीट किए जाने के बाद मामले ने यू-टर्न कैसे ले लिया। आरोपी पकड़े भी गए और थाने से छूट भी गए। क्या आमतौर पर दूसरे मामलों में ऐसा होता है ?

दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और अहम सवाल ये कि घटना के अगले दिन आरोपियों द्वारा काउंटर केस दर्ज कराया जाता है। जिसमें लिखा जाता है कि घटना के दिन राय परिवार के हमले से आहत होकर उनका सहयोगी हिस्ट्रीशीटर अपराधकर्मी सुमित राय को हर्ट अटैक आ गया और वह अस्पताल में इलाजरत है।

संभवत अभी है भी। और यहीं से पुलिस की मानवीय संवेदना जागृत हो उठी। लेकिन राय परिवार की अवस्था पर उन्हें तरस नहीं आई। आती भी कैसे ? एक तरफ राजा भोज परिवार था तो दूसरी तरफ गंगू तेली का परिवार।

आखिर पुलिस  घटना के दिन ही उन्होंने आरोपियों का मेडिकल चेकअप क्यों नहीं करवाया। दूध का दूध और पानी का पानी उसी दिन हो जाता। क्योंकि सभी आरोपी शराब के नशे में धुत थे। ऐसा पीड़ित परिवार के शिकायत में भी दर्ज है।

फिलहाल हमारी नजर घटनाक्रम पर आगे भी बनी रहेगी। हमें भी एसडीपीओ की जांच रिपोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई का इंतजार रहेगा।

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