प्रवासी मजदूरों की चित्कार, मौत भी होगी तो लौट के नहीं आएंगे यहां

“सरकार लाख दावा करें, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। लगभग 2 महीने से भी अधिक दिनों से चले आ रहे लॉक डाउन के बीच प्रवासी मजदूरों का हाल बेहाल है

जमशेदपुर (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क)। झारखंड के लौह नगरी जमशेदपुर मजदूरों का शहर कहा जाता है, लेकिन आज यहां बिहार के भागलपुर, बांका, झारखंड के गोड्डा, पाकुड़ और बंगाल मुर्शिदाबाद के सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर भुखमरी की कगार पर आ गए हैं।

लाख प्रयासों के बाद भी वहां फंसे दिहाड़ी मजदूर अपने गांव वापस नहीं लौट पा रहे। वैसे पिछले महीने 13 तारीख को ये सभी दिहाड़ी मजदूर पैदल ही बिहार के भागलपुर के लिए निकल पड़े थे, लेकिन जिला प्रशासन ने इन्हें वापस लौटा दिया।

वही इन मजदूरों के पास अब ना तो खाने का कुछ सामान बचा और ना ही इनके पास पैसा ही बचा। ऐसे में बेहाल मजदूर अब बिहार-झारखंड और बंगाल के मुख्यमंत्रियों की बाट जो रहे हैं।

वैसे इनके लिए धर्म और मजहब की दीवारों को तोड़ स्थानीय मुखिया आफताब भाई मसीहा बनकर उभरे हैं। जो लगातार अपने प्रयास से यहां फंसे मजदूरों को वापस बिहार भेजने की कवायद कर रहे हैं।

सभी मजदूर बर्मामाइंस के कैरेज कॉलोनी में फंसे हुए हैं इनके पास ना तो खाने का अनाज है और ना कमाया गया पैसा ही इनके पास बचा है। इन मजदूरों का कहना है कि अगर मौत ही हो तो अपने घर पर हो। दोबारा लौटकर वापस जमशेदपुर नहीं आएंगे।

वैसे आफताब भाई काफी प्रयास कर रहे हैं। इन मजदूरों को उनके गांव तक भेजने के लिए, लेकिन राजनीतिक रंजिश और प्रशासनिक बाध्यता के बीच सैकड़ों मजदूर दाने-दाने को मोहताज हैं।

केंद्र सरकार के निर्देश के बाद झारखंड सरकार मजदूरों को वापस भेजने की कवायद में जुटी हुई है, लेकिन उन्हें प्राथमिकता तय करना होगा, क्योंकि ऐसे हजारों मजदूर अभी भी फंसे हुए हैं. जिनके पास दो वक्त की रोटी का भी कोई मुकम्मल प्रबंध नहीं है।

उधर स्वयंसेवी संगठनों ने भी प्रशासन के भय से मजदूरों को राहत सामग्री पहुंचाना बंद कर दिया है। ऐसे में अगर इन मजदूरों के साथ कोई अनहोनी होती है, तो उसके लिए जवाबदेह कौन होगा।

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