पल्स पोलियो और शिक्षा कार्यक्रम के बहिष्कारक इस गांव में विकास का सच

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एक्सपर्ट मीडिया न्यूज। आज कल मीडिया में एक आम फैशन चल पड़ा है, न्यूज़ क्रिएट करने की। छपाऊ मानसिकता के लोग प्लांटेड खबरों का जी भर इस्तेमाल करते हैं। अब इसमें सुदूर गांव वाले भी पीछे नहीं रहे। वे भी वह सब खूब करने लगे हैं, जिन्हें किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं ठहराया जा सकता। शासन-प्रशासन को इस ओर यथासंभव कानूनी कार्रवाई करने की जरुरत है ताकि, इस तरह की प्रवृतियों को नियंत्रित किया जा सके।

खबर है कि नालंदा जिले के नगरनौसा प्रखंडान्तर्गत अरियावां पंचायत के वार्ड 11 मुरदलीचक गांव में मूलभूत सुविधाओं के मांग को लेकर ग्रामीणों ने अपने बच्चों के साथ शिक्षा कार्यक्रम का बहिष्कार किया है।  इसके पहले 4 जुलाई 2017 को भी ग्रामीणों ने इसी तरह की मांग को पोलियो कार्यक्रम का बहिस्कार किया था।

गांव के अजित कुमार, रामप्रीत राम, हरेंद्र कुमार, रंजीत कुमार, रामलगन पंडित, शशिभूषण प्रसाद, दीपक कुमार आदि ग्रामीणों का कहना है कि गांव में पिछले दो दशक से कोई विकास का कार्य नही हुआ हैं। गांव में मूलभूत सुविधाओं की घोर कमी है।  आवागमन की कोई समुचित व्यवस्था नही है। गांव में न सड़क है, न पक्की गली है, न गंदा पानी निकासी के लिए नाली है और न ही पीने के लिये शुद्ध जल की व्यवस्था। यहां जनप्रतनिधि सिर्फ़ अश्वासन दिया करते है। इसीलिये उन्हें मजबूर होकर सरकारी कार्यक्रम का वहिष्कार करना पड़ता है।

अरियावां पंचायत के मुखिया अनिल कुमार सिंह कहते हैं कि वार्ड 11 मुरदलीचक गांव में वार्ड विकास समिति का चयन नही होने से गांव में नली-गली का काम शुरू नही किया गया है। रास्ता का निर्माण मनरेगा के अंतर्गत होना था, उस योजना को स्वीकृति के लिए जिला को भेजा गया है। स्वीकृति मिलते ही रास्ता निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

प्रखंड विकास पदाधिकारी अरविंद कुमार सिंह भी कहते हैं कि गांव में रास्ता निर्माण को लेकर योजना बना स्वीकृति के लिए जिला को भेजा गया है। अब तक स्वीकृति नही मिल पाई है। स्वीकृति मिलते ही रास्ता निर्माण का कार्य शुरू कर दिया जाएगा।

अब सबाल उठता है कि ग्रामीणों द्वारा मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर बच्चों के भविष्य के साथ खिलबाड़ करना कितनी जायज है।  क्या इतने जाहिल हैं कि वे बच्चों के लिये पोलियो के दो बूंद या प्राथमिक शिक्षा की महता नहीं समझते।

अगर उन्हें किसी समस्या की शिकायत या उसका निराकरण की आवाज उठानी ही है तो अन्य विकल्प भी हो सकते हैं। वार्ड सदस्य, पंचायत समिति, मुखिया, जिला परिषद सदस्य, मुखिया, विधायक, सांसद के आलावे विभागीय फोरम भी हैं। जहां उचित माध्यम से समस्याओं को रखा जा सकता है।

मुरदलीचक गांव की बाबत अरियावां पंचायत के मुखिया अनिल कुमार सिंह एक्सपर्ट मीडिया न्यूज से कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है कि वहां दो दशक के दौरान कोई विकास कार्य नहीं हुआ है। गांव में बिजली है। पेयजल के लिये आधा दर्जन चापानल लगे हैं। आधुनिक विद्यालय भवन का निर्माण हुआ है। गलियों में नाली और ईंट सोलिंग का काम हुआ है।

मुखिया बताते हैं कि उनके पहले के तीन मुखियाओं ने भी गांव में विकास के कई कार्य कराये हैं। गांव को मुख्य संपर्क सड़क से जोड़ने वाली मार्ग पर ईंट सोलिंग किया गया था। जो कि भारी वाहनों खासकर ट्रैक्टरों आदि के अनियंत्रित परिचालन से काफी क्षतिग्रस्त हो गया है। उस मार्ग को दुरुस्त करने की प्रक्रिया प्रशासनाधीन है। जहां तक  गांव में जल निकासी के लिये नाली की बात है तो एक स्थान पर लोग ही उसका निर्माण नहीं होने दे रहे हैं। उनके पहले तीन मुखियाओं ने योजना पास कराई, लेकिन गांव वाले ही कोई इधर तो कोई उधर निर्माण करने की जिद कर कभी काम होने ही नहीं दिया। बनी नालियों को भी गांव वालों ने भर-भूर कर क्षतिग्रस्त कर दिया है।

पोलियो अभियान के बाद शिक्षा कार्यक्रम को अवरुद्ध किये जाने की सूचना मिलते ही मुरदलीचक गांव का आंकलन करने पहुंचे अंचलाधिकारी कुमार विमल प्रकाश कहते हैं, गांव में पीसीसी ढलाई पथ नहीं है। पहले का ईंट सोलिंग किया हुआ है। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में आना-जाना मुश्किल हो जाता है। बाकी कोई खास समस्या वहां देखने नहीं मिली।

अंचलाधिकारी बताते हैं कि आज कल गांवों में बहुत ही गंदा पॉल्टिक्स देखने को मिल रहा है। शातिर ग्रामीण लोग सामने सिखा-पढ़ा बच्चों और महिलाओं को खड़ कर देते हैं। अब महिलाओं की मानसिक स्थिति है कि कोई मरे या जिये, जब सुविधाएं ही नहीं मिलेगी तो हम पल्स पोलियो पिलाके या पढ़ाके क्या करेगें। वे कुछ भी समझने को तैयार नहीं होती हैं।

बकौल विमल प्रकाश, ग्रामीण खुद अपनी जिम्मेवारी नहीं समझ पा रहे हैं। कोई स्कूल तक नहीं झांकता कि उनके बच्चे पढ़ रहे हैं या उन्हें पढ़ाया जा रहा है कि नहीं। उनकी विकास की योजनाएं सही ढंग से क्रियान्वित हो रही है या कि नहीं। उसकी गुणवत्ता ठीक है कि नहीं। आम तौर पर तो यह देखने को मिलता है कि नालियों को गांव वाले ही भर देते हैं। कभी कोई साफ-सफाई नहीं करते। गलियों-संपर्क सड़कों को क्षतिग्रस्त कर डालते हैं। कोई उसकी देखभाल नहीं करता। और उनके सामने समस्या खड़ी होने लगती है तो प्रशासनिक अव्यवस्था उत्पन्न करने की मुहिम में जुट जाते हैं।

बहरहाल, यह एक सच्चाई है कि गांवों में भी कुछ बिचौलिये-दलाल टाइप के लोग आम लोगों को मूर्ख बना कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। उन्हें गांव के विकास से कोई वास्ता नहीं होता। उन्हें सिर्फ और सिर्फ मतलब होता है अपने नीजि स्वार्थ से कि कैसे नई योजनाएं आये और वे उसमें लूट खसोंट मचा सकें।      

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