बिहारी मजदूरों के साथ यूं ब्लैकमेलिंग पर उतरी जमशेदपुर जिला प्रशासन

रांची (एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क)। वतन वापसी के नाम मजदूरों को राजनीति का शिकार बनाना दुर्भाग्य है। पैसे कमाने की चाह लिए मजदूर अपने-अपने गांवों से हजारों किलोमीटर दूर फंसे हुए हैं। लॉक डाउन के कारण मजदूर ना घर के रहे न घाट के।

उल्टे राजनीति करने वालों के लिए एक मुद्दा बन चुके हैं। कोई कहता है मजदूरों के खाते में एक हजार रुपए भेजे जा रहे हैं, तो कोई कहता है मजदूरों के लिए पर्याप्त मात्रा में अनाज उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

इन सबके बीच केंद्र सरकार के निर्देश पर प्रवासी मजदूरों को उनके गांवों तक पहुंचाने की व्यवस्था तेलंगाना, गुजरात आदि स्थानों से की जा रही है। वैसे राजनीति यहां भी चरम पर है। केंद्र सरकार कहती है।

 इन मजदूरों को भेजने का पैसा राज्य सरकार वहन करेगी। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी और केंद्र में  विपक्ष  की भूमिका में बैठे कांग्रेस का दावा है कि मजदूरों को उनके घरों तक भेजने का सारा खर्च कांग्रेस उठाएगी, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है।

उल्टे वैश्विक संकट के बीच प्रवासी और अप्रवासी मजदूर राजनीति की रोटी सेकने वालों के लिए मुद्दा बन चुके हैं।

ताजा मामला झारखंड का है। जहां जमशेदपुर के बर्मामाइंस थाना इलाके में बिहार के भागलपुर से दिहाड़ी मजदूरी का काम करने आए सैकड़ों मजदूर प्रशासन के दोहरे मानदंड में  कुछ इस कदर उलझे हैं कि इनके पास एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई। 

वैसे पिछले महीने की 13 तारीख से ही य मजदूर वतन वापसी की बाट जो रहे हैं,  लेकिन जिला प्रशासन की सख्ती के कारण ये मजदूर वापस अपने गांव नहीं लौट सके।

बता दें कि पिछले महीने की 13 तारीख को ये सभी मजदूर पैदल ही अपने गांव के लिए निकल पड़े थे, लेकिन जिला प्रशासन के आश्वासन और सख्ती के बाद ये मजदूर वापस  अपने बस्ती  लौट पड़े।

ताजा आलम यह है कि अब इनके पास न तो कमाए गए पैसे बचे, न ही खाने का एक भी दाना। इन सबके बीच पिछले दिनों मीडिया में खबरें प्रकाशित होने के बाद जमशेदपुर  के उपायुक्त ने  सभी मजदूरों की सूची बनाकर जमा करने का निर्देश जुगसलाई नगरपालिका के कार्यपालक पदाधिकारी को दिया।

जहां कार्यपालक पदाधिकारी ने अपने अधिनस्थ कर्मचारी संतोष कुमार सिन्हा को प्रवासी मजदूरों की सूची  मंगवाने का जिम्मा सौंपा।

उधर इन बिहारी मजदूरों की मदद कर रहे स्थानीय जनप्रतिनिधि आफताब ने  संतोष कुमार सिन्हा को  सभी प्रवासियों मजदूरों की सूची सौंप दी। जहां  सूची लेने के बाद  संतोष कुमार सिन्हा ने वरीय अधिकारियों के आदेश का हवाला देते हुए मजदूरों तक यह सूचना भिजवाई कि जिला प्रशासन उनके लिए बसों की व्यवस्था कर रही है, लेकिन तेल का खर्चा मजदूरों को उठाना पड़ेगा। 

जिला प्रशासन के इस फरमान के बाद  मजदूरों के हाथ पांव फूलने लगे। कुछ मजदूरों ने तो कर्ज वगैरह लेकर हामी भर दी, लेकिन सैकड़ों ऐसे मजदूर प्रशासन के इस रवैया से हैरान-परेशान हैं।

वैसे मजदूरों ने  झारखंड और बिहार के मुख्यमंत्रियों से  एक बार फिर से  अपने सुरक्षित वतन वापसी की फरियाद लगाई है। मजदूरों ने बताया कि प्रशासन का  यह कैसा फरमान है, एक तरफ हम दाने-दाने को मोहताज हैं।

दूसरी तरफ हमारे लिए रहमत की यह कौन सी सौगात जिला प्रशासन ने भिजवाया है।  मजदूरों ने बुझे शब्दों में कहा अब हमारी बच्ची खुशी आज भी टूट चुकी है। अब अगर  प्रशासन उन्हें अनुमति नहीं  देगी  तो वे चोरी- छुपे  यहां से अपने वतन को कूच कर जाएंगे।

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