सेना की मनमानी से त्रस्त ग्रामीणों की सीएम से गुहार

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रांची (मुकेश भारतीय)। दीपा टोली सेना छावनी से सटे एक बहुचर्चित गांव है सुगनु। इस गांव में सासंद रामटहल चौधरी का ससुराल भी है। लेकिन उनके लाख प्रयास के बाबजूद आम ग्रामीण के मौलिक अधिकार नक्कारखाने की तूती बनी हुई है। सेना की वेबजह रोक-टोक से यहां मरनी-हरनी और शादी-विवाह तक आफत आ गई है। गांव वाले कहते हैं कि सुगनु में नहीं हो पाता है कोई शगुन, वहीं अन्य गांव वाले कहते हैं कि सेना की सार्वजिक रास्ता तक आने-जाने पर अघोषित रोक से सुगनु में कौन करेगा कोई शगुन।

हाल ही में स्थानीय सांसद रामटहल चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षामंत्री मनोहर परिकर को एक साथ पत्र लिख कर सुगनु गांव की पीड़ा जताई है।

sugnu road mapउक्त पत्र के अनुसार दीपा टोली सेना छावनी के अगल-बगल में सुगनु, कादी टोला, डूमरदगा आदि गांव के लोगों का सड़क, तालाब, मंदिर, स्कूल आदि जैसे स्थानों तक सेना के अफसरों द्वारा बौंड्रीवाल करवाया जा रहा है। उससे प्रभावित ग्रामीण को काफी परेशान हैं। इस मामले को कई बार प्रश्नगत लोकसभा में उठाया गया। इसकी लिखित सूचना प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री को कई बार दिया गया। उस पर विभागीय कार्यालय के द्वारा हर बार लिखित सूचना दिया गया कि सेना आम ग्रामीणो को किसी स्तर पर परेशान नहीं करती है और इससे जुड़े हर आदेश-निर्देश कागज पर ही सिमट कर रह जाता है तथा गांव वालों की सेना द्वारा हर की प्रताड़ना अनवरत जारी है।

सांसद ने लिखा है कि उपरोक्त गांवों की हजारों एकड़ जमीन सेना छावनी के नाम पर कौड़ियों के भाव में ले लिया गया है।  ठीक इसी तरह नामकुम सेना छावनी के द्वारा गाड़ीगांव के लोगों को भी काफी परेशान किया जा रहा है। यहां के ग्रामीणों को गांव आने जाने के लिए सैकड़ों साल से एक ही रास्ता है। उस पर भी सेना वाले चलने से परेशान करते हैं। यहां तक कि सेना द्वारा छोटे-छोटे पीसीसी पथ का निर्माण तक करने नहीं देते हैं।

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  गौरतलब है कि वर्ष 1972 में रक्षा विभाग द्वारा सुगनु गांव में जमीन अधिग्रहण हुआ था। उस समय भविष्य में रास्ता या फिर सार्वजनिक स्थलों को लेकर कोई परेशानी नहीं होने देने का वादा किया गया था। पहले यहां अंग्रेजों का भी कैंप था। तब  रास्ते का कोई विवाद नहीं था और न गांव वालों को उनसे कोई परेशानी थी। लेकिन छावनी के स्थापना के कुछ वर्षों बाद गांव के लोगों की आवाजाही रोके जाने लगे। इसे लेकर कई बार सेना और ग्रामीणों के बीच जमकर विवाद भी हुआ। कई बार यह मामला विधानसभा औऱ लोकसभा में भी उठा। लेकिन लाख आश्वासन के बाबजूद नतीजा सिफर ही रहा। हालत यह है कि जब कोई नया सेना के अधिकारी आते हैं, तब विवाद खड़ा हो जाता है। वर्ष 1993 में सेना की ओर से सुगनु के 40 परिवारों को पुनवार्स के नाम पर 6-6 डिसमिल जमीन देने का वादा कर बेघर कर दिया गया, परंतु स्थिति यथावत है।

वर्ष 2010 में तात्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने सुगनु गांववासियों को रास्ता दिलाने के लिए प्रधान सचिव को उच्चस्तरीय बैठक बुलाने का आदेश दिया था। लेकिन वह आदेश महज आदेश बनकर ही रह गया। उनके समक्ष यह सबाल उठाया गया था कि सेना छावनी वाले टाटा रोड, नामकुम सदाबहार चौक से तुपुदाना, करमटोली चौक से टैगोर हिल मार्ग का रास्ता कभी नहीं रोका जाता है तो फिर सुगनु गांव को लेकर सेना की मनमर्जी क्यों ?

बहरहाल, इस बार सुगनु गांव वालों ने वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास से न्याय की गुहार लगाई है। एक सामूहिक ज्ञापन के जरिये श्री दास से मांग की गई है कि सुगनु व डुमरदगा के लिए वर्ष 1991 में तात्कालीन रक्षामंत्री शरद पवार एवं संसदीय कार्यमंत्री, भारत सरकार द्वारा आजादी पूर्व से एन.एच-33 से जुड़ने वाली सड़क की स्वीकृति दी थी। वर्तमान में सेना द्वारा इस पथ पर सुगनु और डुमरदगा गांव से सटा कर गेट लगाया जा रहा है। यदि यह गेट लग गया तो ग्रामीणों को रांची शहर आने के लिए 35 किमी की दूरी तय करनी पड़ेगी। ग्रामीणों को मुख्यमंत्री से उम्मीद है कि वे तत्काल कोई ठोस कदम उठाकर वर्षों से राहत की आकांक्षा को जरुर बल देगें।

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