सत्ता बदली, लेकिन नहीं बदली यह सड़क, कहां है सबका साथ, सबका विकास

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“जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है… वैसे-वैसे लोगों का मिजाज भी बदलने लगा है  और विरोध-प्रदर्शन का दौर भी शुरू हो गया है। लोग अब जनप्रतिनिधियों और सरकार के खिलाफ जमकर विरोध-प्रदर्शन करने लगे है……”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज (संतोष कुमार)। मामला ईचागढ़ विधान सभा के कुकडू प्रखण्ड के अल्पसंख्यक बहुल गांव चौड़ा की है। जहां सड़क को लेकर विवाद में रहने वाले विधायक साधु चरण महतो और रांची लोकसभा संसद रामटहल चौधरी  के खिलाफ ग्रामीणों ने वोट का बहिष्कार करने का फरमान जारी किया है। वहीं ग्रामीणों का कहना है कि सड़क नही, तो वोट नही..।

ये उबड़ खाबड़ रास्ते… हिचकोले मारती ये गाड़ियां… सर पर बोझा उठाकर पगडंडियों के सहारे चलना.. सहज ही आपको ये तस्वीरे आजादी से पहले के भारत के गावों की याद दिला रही होंगी।

ये तस्वीर हमने लिया है झारखंड और पश्चिम बंगाल के सीमा से सटे सरायकेला- खरसावां जिला के तिरुलडीह से। पश्चिम बंगाल से कारगिल मोड़ तक लगभग 9 किलोमीटर सड़क की है ये।

बता दें कि केंद्र के साथ ही झारखंड में भी भाजपा की सरकार है और यहां के सांसद विधायक भी भाजपा से ही है। जहां सांसद रामटहल चौधरी और विधायक  साधु चरण महतो के बनने के बाद क्षेत्र के लोगो को लगा था कि उनके वादे के मुताबिक गांव की यह सड़क बन जाएगी।

लेकिन लंबे समय से बीजेपी के सांसद, विधायक रहने के बावजूद सांसद या विधायक  द्वारा सड़क बनाने की दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं लिया। जिससे लोगों में रोष व्याप्त है। यहां के लोग सांसद, विधायक के नाम से ही बिफर पड़ते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बनाने के लिए कई बार आवेदन दिए आज तक कुछ नहीं हुआ। अब क्या उम्मीद करें? इस सड़क से प्रतिदिन कॉमर्शियल और निजी वाहन काफी संख्या में चलते हैं, सरकार को इसके एवज में मोटा राजस्व मिलाता है।

लेकिन आज तक सड़क नहीं बना। वहीं इसके लिए प्रशासन या जनप्रतिनिधियों द्वारा इस सड़क को बनाने के लिए कोई पहल नही किया गया। सड़क आज जगह-जगह उखड़कर गड्ढों के रूप में तब्दील हो चुकी है।

स्थिति इतनी भयावह है कि कोई भी यात्री वाहन गांव आना नहीं चाहता है। यदि गांव कोई प्रसव पीड़ित महिला को प्रसव दर्द उठ जाए तो मरने के सिवा कोई चारा नहीं है। ऐसे में स्थानीय विधायक, संसद व सरकारी महकमे पर उंगली उठना लाजमी है।

वैसे केंद्र और राज्य सरकार भले ही ग्रामीण सड़कों को मुख्य सड़क से जोड़ने की ढिढोंरा पीटती हो, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की चुप्पी कई सवालों को जन्म दे रही है।

आखिर क्या मामला है कि वे इन सड़कों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। ये सड़क झारखंड पश्चिम बंगाल के करीब दो दर्जन गांवों की मुख्य ग्रामीण सड़क करीब 10 हजार लोगो की आबादी वाले लोगों को स्टेट हाइवे से जोड़ती है और हर दिन यहां के लोगों को भगवान का नाम लेकर चलना पड़ता है।

इसे बनाने को लेकर सरकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। जिस कारण गांव वाले नेता अफसर के नाम से चिढ़ते हैं।

हैरानी की बात ये है कि इन गांवों मे चौड़ा एक ऐसा गांव है जो अल्पसंख्यक बहुल्य गांव है। इस गांव की आबादी करीब 10 हजार है, जहाँ के लोग नाइटी, पेटीकोट जैसे छोटी-मोटी लघु उद्योग के  सहारे अपना गुजर- बसर करते है। चौड़ा से पश्चिम बंगाल ही नही बल्की छतीसगढ़, मुम्बई तक सस्ते दरो पर नाईटी पेटीकोट सिंलाई कर भेजा जाता है। 

झारखण्ड अलग राज्य गठन के बाद ईचागढ़ विधानसभा के तत्कालीन  विधायक अरविंद कुमार सिंह उर्फ मलखान सिंह के कार्यकाल में इस सड़क को बनाया गया था। उसके बाद आज तक इस सड़क के जीर्णोद्धार के लिए न तो किसी जनप्रतिनिधि ने हाथ बढ़ाया न ही किसी प्रशासनिक पदाधिकारी ने। जबकि इस सड़क से आए दिन प्रखंड से लेकर जिला के आला अधिकारी का आवागमन होता है।

झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के सरायकेला जिला सचिव सुकराम हेम्ब्रम ने विधायक व संसादों के कार्यशैली पर सवाल खड़ा करते हुए ईचागढ़ के स्थानीय विधायक साधु चरण महतो के पांच वर्षो के क्षेत्र में निर्माण हुए सभी सड़को की प्राक्कलन की जांच करने मांग की है। तिरुलडीह-चौड़ा जर्जर सड़क के साथ विधानसभा में सभी निर्माणाधीन सड़को की जांच की मांग की है।

भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र व खुद को विकास पुरुष बताने वाले झारखंड  के मुख्यमंत्री रघुवर दास भले ही सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ सत्ता में आये थे।

लेकिन स्वार्थी विधायकों ने भारतीय जनता पार्टी के घोषणा पत्र के उद्श्यों को ही बदल डाला। गौर से देखिए तिरूलडीह- चौड़ा सड़क की तस्वीर फिर फैसला कीजिए कि क्या “सबका साथ, सबका विकास” का दावा खोखला साबित नहीं हो रहे है..।

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