संदर्भ पीपरा चौड़ा कांडः बाहरी और भीतरी के आगोश में झारखंड

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रांची (मुकेश भारतीय)। आज झारखंड के शहरी हलकों के अंदर या बाहर किसी गांव-कस्बा में झांकिये। हर कोई अपनी जमीन बेच रहा है और एक बड़ा तबका उसकी दलाली में जुटा है। अचानक दरिंदगी के कारण सुर्खियों में आये नेवरी गांव के पीपरचौड़ा बस्ती की घटना को लीजिए। पूरा मामला दो जमीन दलाल गिरोह की है। आपसी लेन-लेन में एक गिरोह दूसरे गिरोह के सरगना को रात अंधेरे बुलाकर हत्या कर देता है। उसके प्रतिशोध की आग पूरी बस्ती में तबाही मचा देता है। समूचे पुलिस प्रसाशन को अस्त व्यस्त कर डालता है। थाना प्रभारी पर जानलेवा हमला होता है। उन्हें लोगों की सुरक्षा करने के बजाय खुद की जान बचाने को तीन किमी भागना पड़ता है। डीएसपी, एसपी की फौज के सामने अग्निशमन दस्तों को प्रवेश करने नहीं दिया जाता है। मीडिया कर्मियों को भी दौड़ा-दौड़ा कर पीटा जाता है। उनके कैमरे तोड़ आग के हवाले कर दिया जाता है।

अपनी ढाई दशक की पत्रकारीय जीवन में पहली बार एक खास समुदाय के दो गुटों के बीच बाहरी-भीतरी के मुद्दे पर इतने आक्रामक तेवर में देखा है। अमुमन इस समुदाय में इस तरह की समस्याएं देखने को नहीं मिलती है। अगर आप ईरबा, नेवरी या पीपराचौड़ा समेत अनेक स्थानों की पड़ताल करेगें तो साफ स्पष्ट होगा कि असम से कोई एक या दो जाकिर नहीं, बल्कि देश के अन्य प्रांतों से लेकर बांगला देश और सउदी अरबिया तक के बसे लोग मिल जायेगें। वे कब आकर बसे और कब मजबूती से उभर गए। किसी को कुछ पता नहीं चलता। किसी का कहीं आकर बसना या किसी का बसाना, यह बहस का मुद्दा नहीं है।  लेकिन सबाल उठता है कि जब यह खेल होता है तो समाज के उपद्रवी भेड़िए कहां छुपे होते हैं।

पीपरा चौड़ा बस्ती में जमीन दलाल नसीम की हत्या के बाद बाहरी वनाम स्थानीय की आन पर लोग उग्र हो उठे। हिंसा पर किसी कट्टर गुट का उग्र होना स्वभाविक है। लेकिन यह उग्रता हिंसा मचाने के लिए नहीं, अपितु लूट-पाट मचाने के लिए थे। हत्या में जब साथी जमीन दलाल के शामिल होने की बात साफ थी तो फिर समूचे गांव को निशाना क्यों बनाया गया ? हमलावर गांव के लोगों को जाहिलता की श्रोणी में भी नहीं रखा जा सकता। ये ऐसे उपद्रवी हैं, जिनकी विक्षिप्त मानसिकता है कि पहले बसाओ। और फिर उनकी खुशहाल हालत को छीन लो। यहां हर तरफ यहीं सब दिख रहा है।

नेवरी गांव हो या पीपरा चौड़ा बस्ती। यहां मेहनत कश लोग भी हैं, जो दलाली-मक्कारी कर ऐय्यासी करते नहीं फिर रहे हैं बल्कि, वे अपनी खून-पसीने की कमाई से एक घर और उसमें बसे भविष्य को संवारने की आमरन आकांक्षा रखते हैं। क्या किसी एक अपराधी के करतूत की सजा उस पूरे समाज पर प्रहार है। अगर पीपरा चौड़ा का एक जाकिर दरिंदा है तो नेवरी के सैकड़ों उपद्रवी लुटेरों को क्या कहा जाए। जिन्होंने बेकसूर लोगों के घरों में आग लगा दी। उनकी जीवन भर की कमाई छीन ली। उन्हें खुले आसमान में दर दर की ठोकरें खाने को लाचार कर दिया। इनकी हिम्मत तो देखिए कि जो भीड़ रात अंधेरे प्रतिशोध में तबाही मचाती है, वही भीड़ दिन उजाले शव के साथ प्रदर्शन कर न्याय और मुआवजा की मांग करती है। हत्यारों के साथ इन उपद्रवियों पर भी कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

सबसे बड़ी बात कि समुदाय या संप्रदाय कोई हो। देश में कहीं भी किसी को गुजर बसर का हक-हकुक है। यह हमारे संविधान की मूल भावना जीने का अधिकार में निहित है। मगर आज इसे क्षेत्रीय स्तर पर मरोड़ा जा रहा है। कूपमंडूक नेता इसे दिन रात हवा देते रहते हैं। उन्हें लगता है कि झारखंड एक संघीय प्रांत का हिस्सा नहीं, उनकी खुद की राष्ट्रीय जागीर है और  इसके रक्त बीज गांव तक आ पहुंचा है। एक मोहल्ला वाले दूसरे मोहल्ले वाले को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं। एक गांव की भौंए हमेशा पड़ोस की गांव पर तनी रहती है। एक जेवार के खिलाफ दूसरे जेवार वाले हमेशा लाठी लिए तैयार खड़े मिलते हैं। आखिर इस मानसिकता का अंत क्या है।

हर जाति, वर्ग और मजहब के नेताओं की मानसिकता यहां के नई पीढ़ी  में भी भर रहा है और जब तक यह मानसिकता बनी रहेगी, किसी एक अपराध की आड़ में पीपरा चौड़ा जैसी उपद्रवी घटनाएं पनपती रहेगी।

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