वेशक मिसाल है नालंदा के बेन थानाध्यक्ष के अधिवक्ता पति की सोच

0
25

“एक मुकम्मल संघर्ष ही सही तस्वीर उकेरती है। एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क की यह वैसा ही रेखांकन है, जिसे समाज और व्यवस्था के हरेक पहलु को बतौर मिसाल स्वीकार कर इनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। क्योंकि परिस्थितियां चाहे जो भी हो, जैसी भी हो। वाकई कर्म का निर्वाह ही असली धर्म है…..”

-: मुकेश भारतीय :-

पुलिस और अधिवक्ता का हमेशा छत्तीस का आकड़ा रहा है। दोनों की आपस में कहीं न कहीं शिकायत जरुर होती है। लेकिन जरा कल्पना कीजिए बात जब एक महिला पुलिस अफसर और एक पुरुष पेशेवर अधिवक्ता की हो, वह भी उस परिस्थिति में जब दोनों सात जन्मों के अटूट परिणय सूत्र में बंधे हो तो उसका आंकलन करना कितना मुश्किल है

जी हां, हम बात कर रहे हैं जमुई सत्र न्यायालय के अधिवक्ता विजय कुमार और उनकी धर्मपत्नी पिंकी प्रसाद की, जो फिलहाल नालंदा जिले के बेन थानाध्यक्ष हैं। मूलतः जमुई जिला शहर निवासी पिंकी प्रसाद वर्ष 2009 पुलिस बैच की पुलिस अफसर हैं। बेन के पहले वे करीब 13 महीना कतरीसराय, 22 महीना पावापुरी ओपी, 24 माह नालंदा जिला महिला थानाध्यक्ष के अलावे आदर्श थाना दीपनगर में बतौर सब इंसपेक्टर पदास्थापित रह चुके हैं।

हालांकि पिंकी प्रसाद को लोग अमुमन कड़क मिजाज पुलिस अफसर के रुप जानते हैं, लेकिन उनके करीबी लोगों की नजर में वे एक आम भारतीय सुसंस्कृत व मृदुभाषी नारी हैं, जो अपने हर दायित्व और कर्त्यव्यों का पूरी पारदर्शिता से निर्वाह करते हैं।

बहरहाल, हमने उनके अधिवक्ता पति से एक पुलिस अफसर पत्नी को लेकर दो टूक बात की। पिकीं प्रसाद को लेकर उनके अंतर्मन को टटोलने की कोशिश की। उनसे बातचीत के पहले सारी उम्मीदें धाराशाही हो गई। पहले वही पुरानी मिथक कि पुलिस-अधिवक्ता के बीच कोई न कोई अंतर्द्वंद की रोचकता अवश्य मिलेगी। लेकिन किसी ने ठीक ही कहा है कि कहां किसी की आरजू पूरी हुई है, यह तो हर सख्श की अधूरी रही है।

उनसे बातचीत की शुरुआत ही सब पोल खोल गई, जब उनसे पूछा कि आप बेन थानाध्यक्ष यानि अपनी धर्मपत्नी पिंकी प्रसाद के बारे में कितना जानते हैं? इस पर हंस पड़े और कहा कि अगर आपकी शादी हो चुकी है तो आप बेहतर जानते हैं। एक अधिवक्ता पति के ऐसी सरलता आगे राह आसान करती नजर आई। जो हिचक थी,वो ख्तम हो गई। हिचक इसलिए कि सामान्यतः लोग पदासीन पत्नी से जुड़े सबालों पर भड़क उठते हैं। सीधे यह बोल कन्नी काट लेते हैं, पत्नी के सबाल पति से क्यों पूछते हैं। ऐसे कई मौके मुझे झेलने पड़े हैं।

आगे श्री कुमार ने अपनी पुलिस अफसर पत्नी के अब तक पारिवारिक व्यवहार की बाबत बताया, ‘बहुत ही अच्छा और बहुत ही सहयोगात्मक। पुलिस अफसर बाद में हैं, पहले धर्मपत्नी हैं।’

पिंकी जी पुलिस सेवा में हैं। उनका अपना दायित्व और कार्यशैली है। यह आपको नीजि तौर पर कितना प्रभावित करता है?  इस घुमाऊ प्रश्न पर सरलता से कहा, ‘दोनों का कार्य क्षेत्र एक है। दोनों व्यक्ति कानून का ही काम कर रहे हैं। एक समाज में कार्यपालिका से जुड़ी है। लॉ एंड आर्डर मेंटन करती है और दूसरा न्यायपालिका से जुड़े हैं। देखा जाए तो दोनों का कार्य क्षेत्र लगभग मिलता जुलता है। इसलिए प्रभावित करने का सवाल ही नहीं उठता।’

फिर भी एक पुलिस अफसर और एक अधिवक्ता, दांपत्य जीवन में इसके साथ कैसे सामंज्य स्थापित करते हैं? इस पर विजय कुमार का दो टूक कहना रहा कि दोनों अपना-अपना काम करते हैं।

जब उनसे पूछा गया कि पुलिस पर आए दिन तरह-तरह के आरोप लगते रहते हैं। अपराधिक कार्रवाई करने के दौरान आपकी पत्नी पर भी कई आरोप लगे,उन पर कई गंभीर मुकदमें भी दर्ज हुए। उसे करने-कराने वाले अधिवक्ता ही होते है। नहीं लगता है कि ये पुलिस के मनोबल तोड़ने वाले होते हैं?

इस पर उनका कहना था कि नहीं ऐसी बात नहीं है। सब अपने काम के अभियस्त होते हैं। हां उनकी पत्नी जिस क्षेत्र में सेवारत हैं, वहां आरोप-प्रत्यारोप आम बात है। सबसे बड़ा धर्म तो कर्म है और कर्म हमेशा वेदाग होता है। मनोबल बढ़ाने वाला होता है।

आज पुलिस-तंत्र में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। उसमें एक नई व्यस्था आकार ले ली है। खासकर राजनीतिक दबाव या अधिकारिक अनुशासन की बात हो तो इसमें किसी भी पुलिस अफसर के लिए काम करना बड़ा मुश्किल होता है। ऐसे में….?  इस पर अधिवक्ता पति का मानना है कि देखिए, कुछ भी हो जाए। अपराध होगा ही। पुलिस भी कानून के अनुसार अपना काम करेगी ही। राजनीतिक हस्तक्षेप हो या न भी हो, लेकिन कानून के अनुसार तो सभी को चलना पड़ेगा। कितने अफसर आए हैं। कितने अफसर गए हैं। लेकिन कानून तो अपने जगह स्थिर है। उसी के अनुसार सभी को अपना काम करना पड़ेगा। अपराधी कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक दिन उसे कानून के सामने समर्पण करना ही पड़ता है।

एक पुलिस पदाधिकारी के कार्य और जबावदेही काफी कठिन होती है। खासकर उस परिस्थिति में जब वे बतौर एक महिला किसी की मां-धर्मपत्नी भी हों, ऐसे में आप उन्हें कितना मदद कर पाते हैं? इस पर उनका कहना था कि मदद क्या करेगें। उन्हें नैतिक सपोर्ट ही न कर सकते हैं। हम अधिवक्ता हैं। हम अपना न्यायालय का काम देखते हैं। वे अभी थानेदार हैं। थाना की काम देखती हैं। अगर कोई मामला होता है तो हल्का-फुल्का पारिवारिक तौर ही सलाह-मशवरा होती है। आपस में गपशप होता है, लेकिन यहां तो अपना-अपना काम खुद ही देखना होता है। थाना में कार्य करने का उनका तरीका अलग है। न्यायालय में काम करने का तरीका अलग है।

क्या कभी ऐसा अवसर मिला है कि आपकी पत्नी पर आरोप लगे हों और उसकी पैरवी आपको करनी पड़ी हो?  इस पर श्री कुमार का कहना था कि नहीं मिला है। वे जमुई कोर्ट के अधीन हैं। उनकी पत्नी नालंदा में पदासीन रहे हैं। जो भी आरोप लगे होंगे, वहीं के न्याय क्षेत्र में है।

हालांकि इसी दौरान अधिवक्ता पति विजय कुमार की खिलखिलाहट में भी कहीं न कहीं यह कसक जरुर महसुस हुई, जब उन्होंने कहा कि पुलिसिंग का काम ही ऐसा है कि फैमिलि छूट जाए तो छूट जाए कार्य नहीं छूटनी चाहिए। पिताजी भी अधिवक्ता हैं। दो बच्चें हैं। एक बड़ा बेटा पटना में रहकर मेडिकल की तैयारी कर रहा है।

दूसरा छोटा बेटा साथ में रहता है। बड़ा वाला बेटा अभयस्त हो गया है। छोटा वाला कभी मम्मी को लेकर सवाल करता है। धीरे-धीरे वे भी अभ्यस्त हो जाएगा। यहां (जमुई) हम सब मिलकर पारिवीरिक जिम्मेवारियों का निर्वाह कर रहे हैं। हम लोगों का लाइफ इसी तरह चलेगा  और ईश्वर करे कि यूं ही अनवरत चलता रहे। (जारी….)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.