राजगीर महोत्सव के नाम पर देखिये प्रशासनिक वेशर्मी की हद

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“कतिपय लोग राजगीर महोत्सव को लेकर उत्पन्न ताजा हालात को सीएम-पीएम के बीच की राजनीति से जोड़ रहे हैं। लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। यहां सब बतौर प्रशासनिक तकनीकी पहलु हैं। पर्यटन विभाग और नालंदा प्रशासन ने जिस तरह से बिना अनुमति के कार्य किये, उस महौल में कार्यक्रम की आम स्वीकृति देकर भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण निदेशालय का कोई अधिकारी अपना गर्दन फंसाने को तैयार नहीं हुये”   

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज / मुकेश भारतीय भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण निदेशालय की बगैर मंजूरी के अन्तर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल स्थित अजातशत्रु किला मैदान में ‘राजगीर महोत्सव’ की सारी तैयारियों लगभग पूरी हो चुकी थी। लेकिन कल देर शाम पर्यटन विभाग एवं नालंदा जिला प्रशासन ने वहां से अचानक सब कुछ हटाने का निर्णय लिया।

आज पहले निर्धारित स्थान से अन्य जगहों पर अलग-अलग कार्यक्रमों की तैयारी युद्ध स्तर पर शुरु कर दी गई है।

पूर्व के मंच, पंडाल इत्यादि उखाड़े जा रहे हैं। नीजि व सरकारी वाहनों से अलग ढोये जा रहे हैं।

जाहिर है कि सरकारी एक काम के दो अलग-अलग खर्च किये जा रहे हैं। यह सब विभाग और प्रशासन की नादानी के कारण ही हो रहा है।

जिला प्रशासन का तर्क है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने अपनी स्वीकृति में जो शर्तें रखी है, उस आलोक में पूर्व निर्धारित स्थल पर कार्यक्रम करना संभव नहीं था।

हालांकि भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण निदेशालय द्वारा संरक्षित व वर्जित अजातशत्रु किला मैदान क्षेत्र में सशर्त स्वीकृति विगत 23 नवबंर को दी थी। 

लेकिन इसके पहले ही पर्यटन विभाग और जिला प्रशासन ने पानी की तरह पैसे बहाते हुये मनमानी निर्माण शुरु कर दिये। स्वीकृति मिलने तक तो प्रायः अस्थाई निर्माण हो चुके थे।

ऐसे में सवाल उठना लाजमि है कि जब भारतीय पुरातत्व एवं सर्वेक्षण निदेशालय द्वारा स्वीकृति नहीं मिली थी तो वर्जित क्षेत्र में कार्यक्रम की तैयारी क्यों गई। लाखों-करोड़ों क्यों खर्च किये गये।

फिर जब कार्यक्रम की सशर्त स्वीकृति मिल गई तो फिर किस कारणवश अन्य जगहों पर कार्यक्रम आयोजित के नाम पर लाखों-करोड़ों खर्च किये जा रहे हैं।

क्या वे पैसे किसी विभाग या उसके पदस्त अधिकारी के पर्सनल एकाउंट के हैं या कहीं से दान में मिले हैं?

वेशक वे पैसे आम जनता की गाढ़ी कमाई के हैं, जिसे सरकारी स्तर पर लुटाये गये और लुटाये जा रहे हैं। इसे प्रशासनिक वेशर्मी की हद से इतर कुछ नहीं कहा जा सकता।

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