भीम की कृपा से आसान हो गया है सब

भारत देश के संविधान निर्माता कहे जाने वाले दलितों के मसीहा डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती का अवसर। दलित बस्तियों में अलक सुबह से देर रात तक जयन्ती समारोहों का आयोजन। गायक मण्डलियों का रोचक और कर्णप्रिय संगीत का मुजाहिरा।

…भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी, वरिष्ठ नागरिक/स्तम्भकार, अकबरपुर-अम्बेडकरनगर, (उ.प्र.)9454908400

जय भीम, नमो बुद्धाय के गगनभेदी उद्घोष से समूचा वार्तावरण गुंजायमान। बड़ा आनन्द………और आनन्द ही आनन्द…….. परन्तु………एक बात खटकी………..

डॉ. अम्बेडकर जयन्ती समारोह स्थलों पर वक्ताओं द्वारा ध्वनि विस्तारकों के माइक पर यह कहा जाना………….. ‘जय भीम, नमो बुद्धाय’…………..। खटकने का कारण यह कि वक्ता बन्धु के लिए डॉ. अम्बेडकर सर्वोच्च स्थान पर और द्वितीय स्थान पर गौतम बुद्ध क्यों………..? रहा नहीं गया………

एक डॉ. अम्बेडकर समर्थक व्यक्ति से पूछा- डियर यह बताओ कि- आप लोग अपने सम्बोधन में भीड़ के समक्ष जय भीम नमो बुद्धाय के बजाय नमो बुद्धाय जय भीम क्यों नहीं कहते। ………………….कुछ देर तक तो वह बोले नहीं फिर कहने लगे कि हमारे लिए डॉ. भीमराव अम्बेडकर ही सब कुछ हैं………….।

हम बुद्ध को उन्हीं की वजह से जानते हैं। यही कारण है कि हम पहले जय भीम कहते हैं उसके उपरान्त नमो बुद्धाय………..। इतना कहकर वह चले गए। कुछ लोग और मिले जिनसे हमने ऊपर वाला ही प्रश्न किया, अधिकांश ने इस पर तर्क करना मुनासिब नहीं समझा और धीरे से खिसक लिए……

एकाध जो बचे रहे उन्होंने स्पष्ट कहा कि डॉ. अम्बेडकर के समर्थक जय भीम नमो बुद्धाय का उद्घोष क्यों करते हैं उसके पीछे बड़ा लॉजिक है………जिसे सम्भवः वह लोग स्पष्ट बता पाने में असमर्थ हैं। कहना पड़ा आप ही लोग बता दो कम से कम हमारी जिज्ञासा तो शान्त हो……..।

एक ने कहा कि सर जी इस समय चुनाव का माहौल है……….यत्र-तत्र-सर्वत्र इलेक्शन को लेकर ही सरगर्मी है। आज नहीं चुनाव खत्म हो जाने दीजिए इसके बाद इस पर चर्चा की जाएगी, और तब आपकी जिज्ञासा अवश्य ही शान्त होगी। ………………………..इतना कह कर दो चार बन्धु और खिसक गए।

बचे तो सुलेमान भाई और कल्लू प्रसाद चाय वाला। दोनों नाम से तो अजीब प्रतीत होते हैं परन्तु अपने-अपने तार्किक अन्दाज से किसी भी जटिल प्रश्न का सहज तरीके से उत्तर देकर शंका समाधान करने में इन्हें महारत हासिल है।

कल्लू कहता है कि सर जी मैं जिस का जिक्र करने जा रहा हूँ उसके बारे में सुलेमान भाई व इनकी बिरादरी का नजरिया निगेटिव है, उसके बारे में ये लोग कुछ भी नहीं सुनना चाहते परन्तु मुझे आपकी जिज्ञासा शान्त करनी है इसलिए मैं निःसंकोच बोलूँगा। मुझे बड़ा अच्छा लगा।

अंगुली के इशारे से कल्लू को बोलने की इजाजत दे डाली। कल्लू ने कहा- सर जी आपको स्मरण होना चाहिए कि कबीर दास ने लिखा है कि……………‘‘गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पांय, बलिहारी गुरू आपने, गोविन्द दियो बताय………।’’

मतलब यह कि ईश्वर से बड़ा गुरू होता है………….वह इसलिए कि उसी ने ही हमें ईश्वर के बारे में बताया है…………। हम गुरू को इसीलिए सर्वोच्च स्थान पर रखते हैं।

दलित समाज के अथवा डॉ अम्बेडकर समर्थक भी इसी लॉजिक पर चल रहे हैं, परन्तु वह इस तरह स्पष्ट बता पाने में क्यों असफल हो जाते हैं यह अवश्य ही चिन्ता का विषय है। कल्लू प्रसाद की तर्क भरी बातें सुनकर बड़ा अच्छा लगा।

इसी बीच कल्लू और सुलेमान में तकरार बढ़ गई……….वह इसलिए कि कल्लू ने ऐसा क्यों कहा कि सुलेमान एण्ड ब्रदर्स कबीर दास को सहज रूप से ग्रहण नहीं करते हैं। परिणाम सिर फुटौव्वल तक हो मुझे बीच-बचाव करना पड़ा।

फिलवक्त मामला शान्त हुआ…….। हम तीनों हमारी बैठक से उठे और कल्लू चाय वाले की दुकान की तरफ चलने लगे। इसी बीच पार्श्व से कर्णप्रिय और सर्वथ प्रासंगिक संगीत सुनाई पड़ा-

‘‘सब भीम की कृपा से आसान हो गया……….भारत में जब से लागू संविधान हो गया है………….’’ सुनकर कुछ देर के लिए हम तीनों के पाँव थिरकने लगे………….।

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