भाजपा अपने ‘शत्रु’ पर कार्रवाई करने में ‘खामोश’ क्यों ?

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“भाजपा अपने ‘शत्रु’ के लगातार पार्टी विरोधी बयानों और भाजपा विरोधी नेताओं के साथ मुलाकात और मंच साझा करने के बाद भी  भाजपा अब तक  ‘खामोश’ क्यों है? बिहारी बाबू की पार्टी से नाराजगी और पीएम मोदी पर तीखे हमले पर खामोशी  के आखिर निहितार्थ क्या है….?

पटना (जयप्रकाश नवीन)। पटना साहिब से  सांसद और राजनीति में भाजपा के ‘शत्रु’ से मशहूर सिने स्टार ‘बिहारी बाबू’ उर्फ  ‘शॉटगन’ शत्रुहन सिन्हा बीजेपी के उन कद्दावर नेताओं में शामिल रहे हैं, जो कभी भीड़ के नायक होते थे।

श्री सिन्हा भाजपा में तब से हैं जब भाजपा के देश में दो लोकसभा सीट हुआ करती थी। शत्रुहन सिन्हा गवाह है कि भाजपा कैसे शिखर पर पहुँची और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने उनको भीड़ जुटाने के लिए कैसे चुनावी रैलियो में ले जाते थे।

लेकिन यहां श्री सिन्हा वर्तमान भाजपा को समझने में चूक गए।वें क्यों भूल गए कि जिन्होंने पार्टी को सींचा, आज उनकी भूमिका बीजेपी में क्या है? ऐसे में उनकी क्या हैसियत है।

सिनेमाई पर्दे पर उनकी बेबाकी और जानदार आवाज वास्तविक जीवन में भी झलकती है। इसे इनका स्वभाव समझें या बगावत। ऐसा नहीं है कि शत्रुहन सिन्हा शीर्ष नेतृत्व पर पहली बार हमलावर रहे हैं।

उन्हें जानने वाले भलीभाँति जानते है कि शत्रुहन सिन्हा रियल लाइफ में भी ‘खामोश’ रहना नहीं जानते हैं।

पिछले चार सालों से भाजपा के सांसद शत्रुहन सिन्हा अपनी ही पार्टी और शीर्ष नेतृत्व पर हमलावर रहे हैं। इसके पीछे श्री सिन्हा के गुस्से का क्या मतलब है। लेकिन यह तय है कि वे पार्टी में अपनी उपेक्षा को लेकर नाराज है।

पार्टी के पास खुद अब  पीएम नरेंद्र मोदी के रूप में चुनाव जीताने वाला चेहरा है।ऐसे में दूसरे चेहरे बीजेपी के लिए गौण हो चुके हैं। पिछले बिहार विधानसभा चुनाव कैंपन से भी उन्हें दूर रखा गया।

यहां तक कि पटना में बीजेपी और पीएम के कार्यक्रम से भी उन्हें दूर रखा जाने लगा। पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह कार्यक्रम से भी उन्हें दूर रखा गया था।

भाजपा के बागी सांसद शत्रुहन सिन्हा ने पिछले दिनों एक निजी न्यूज चैनल के कार्यक्रम में अपने दिल की पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि हारे हुए एक टीवी कलाकार को मंत्री बना दिया गया, लेकिन उन्हें मंत्री नही बनाया गया। उन्होंने कहा कि वो सच बोलते हैं। अगर सच बोलना बगावत है तो वे बागी हैं।

लगता है श्री सिन्हा अब समझ चुके हैं कि उन्हें भाजपा में अब कुछ मिलने वाला नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा आयोजित रैली में शामिल होने के बाद उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि पार्टी उन पर कभी भी कार्रवाई कर सकती है।

लेकिन पार्टी अभी तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जिस तरह भाजपा ने नवजोत सिंह सिधु और कीर्ति आजाद के खिलाफ करने की हिम्मत की थी।

उधर बीजेपी अब तक समझ नही पाई है कि उनके सियासी डॉयलाग लिखता है कौन?  वे अपने ही डॉयलागबाजी से ही पार्टी के अंदर ‘शत्रु’ नजर आने लगे हैं। भाजपा के ‘शत्रु’ कभी पीएम मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर सवाल उठा देते हैं तो कभी नोटबंदी और जीएसटी पर सवाल उठाते हैं।

उन्होंने जीएसटी का मतलब समझाते हुए कहा भी है कि जीएसटी का मतलब ‘गई सरकार तोहार’। कभी लालूप्रसाद के जन्मदिन पर अचानक लालू निवास धमक जाते हैं तो कभी तेजस्वी से मिलने।

बिहार विधानसभा चुनाव के मौके पर बिहार में सियासी अनबन, चुगलियां, आक्षेप के बीच पीएम मोदी ने सीएम नीतीश कुमार पर डीएनए खराब होने का आरोप लगा दिया था।

तब शत्रुहन सिन्हा नीतीश कुमार से गले मिलने सीएम आवास पहुँच जाते हैं। उन्हें विकास पुरुष और एक बेहतरीन सीएम बता दिया था। उन्होंने कहा भी था कि किसी की तारीफ करना गलत बात नहीं है।

देखा जाए तो सिने स्टार बिहारी बाबू ने अपनी किताब ‘एनीथिंग बट खामोश’ के विमोचन के मौके पर उन्होंने बीजेपी की अंतर्मन को झकझोरने का भी प्रयास किया था।

उन्होंने इस मौके पर कहा भी था कि अगर उस समय जब उन्होंने राजनीति में कदम रखा था तब अगर श्रीमती इंदिरा गांधी होती तो वे आज कांग्रेस के होते।

उन्होंने कहा था कि वे श्रीमती गांधी के नैतिक मूल्यों को आज भी मानते हैं। उनसे बहुत प्रभावित भी रहे। बेबाक और बागी अंदाज ही श्री सिन्हा की पहचान भाजपा में रह गई है। उनके राजनीतिक विरोधी उन्हें अवसरवादी कहते हैं।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने विवादास्पद बयानों तथा पार्टी विरोधी बयानों के बाद भी भाजपा नेतृत्व उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से डर क्यों रही है ? बीजेपी को आईना दिखाने वाले श्री सिन्हा का आईना बीजेपी कब तक देखती रहेगी?

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