बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार को यूं कबाड़ा कर रहे हैं पदाधिकारी

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“आखिर इस तरह के फैसले के मायने क्या हैं ? परिवादी चाहें तो अपील में जा सकते हैं- जैसी सलाह देने के पहले सक्षम पदाधिकारी ने लापरवाह लोक प्राधिकार के खिलाफ अधिनियम में प्रावधान के अनुसार कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। जबकि उन्हें निर्देश की बारंबार अवहेलना करने वाले किसी भी लोक प्रधिकार को शास्ति अधिरोपित करने की अनुसंशा करने  करने का स्पष्ट अधिकार प्राप्त है।”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज। जहां पूरे देश में सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 आम व्यवस्था को पारदर्शी बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है, वहीं बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम-2015 राज्य में समस्याओं के समाधान और न्याय पाने का एक बेहतरीन जरिया है। यह बिहार सामान्य प्रशासन विभाग के बिहार प्रशासनिक सुधार मिशन सोसाइटी के तहत कार्य करती है।

लेकिन यह तभी संभव है, जब लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी संवेदनशील हों और  जानकार हों। वे निष्पक्षता से लोक शिकायतों का निवारण करते हों। लोक प्राधिकारों के आगे नतमस्तक न हों।

नालंदा जिले में राजगीर लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी की भूमिका पर सबाल उठ रहे हैं। वेशक उनके फैसले ईमानदारी की कसौटी पर भी खरे नहीं उतरते।

अनुमंडलीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी का कार्यालय में गांधी टोला, राजगीर निवासी अनील साव की 31.05.2017 को स्वीकृत अनन्य संख्या- 527310131051700827 की अंतिम सुनवाई 18.08.2017 को हुई है।

परिवाद का संक्षिप्त विवरण था- “राजगीर का पत्रांक 167 राजगीर, दिनांक 15.03.2013 के आलोक में अबतक बंद पड़ा शौचालय को अब तक चालू तो नहीं कराया गया किन्‍तु नौलखा मंदीर से पश्चिम तरफ सनातन धर्मशाला के उत्तर बंद शौचालय को घ्‍वस्‍त कराकर निर्माण तक करा दिया है, अत: सभी बंद शौचालय त्‍वरित चालु कराया जाय।“

परिवाद में कहा गया था कि राजगीर नगर पंचायत के कार्यपालक पदाधिकारी के पत्रांक 167 दिनांक 15.03.2013 के आलोक में अब तक बंद पड़ा शौचालय को चालु नहीं कराया गया है। किन्तु नौलखा मंदिर से पश्चिम तरफ सनातन धर्मशाला के उतर बंद शौचालय को धवस्त कराकर निर्माण तक करा दिया गया है। अत: सभी बंद शौचालय को त्वरित चालु कराया जाए।

परिवाद में यह भी कहा गया था कि प्राक्कलित राशि के आवंटन के बाद भी शौचालय का निर्माण नहीं हुआ। परिवाद के साथ कार्यपालक पदाधिकारी, नगर पंचायत राजगीर का पत्रांक 167 दिनांक 15.03.2013 की छायाप्रति (सूचना के अधिकार से प्राप्त) भी संलग्न की गई थी।

इस परिवाद में कोई लोक प्रधिकार कभी भी उपस्थित नहीं हुये। दो बार उनके प्रतिनिधि हाजिर भी हुये तो समय की मांग की गई। अब इस परिवाद में राजगीर लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी का जो अंतिम आदेश आया है, वह काफी चौंकाने वाला है।

अंतिम आदेश में लिखा है कि इस परिवाद के आलोक में लोक प्राधिकार नगर कार्यपालक पदाधिकारी, नगर पंचायत राजगीर को ज्ञापांक 52731-02589 दिनांक 01.06.2017 को नोटिस भी निर्गत किया गया एवं सुनवाई की विभिन्न तिथियों 07.06.2017, 14.06.2017, 23.06.2017, 07.07.2017, 21.07.2017, 28.07.2017, 04.08.2017 एवं 11.08.2017 को अपना पक्ष रखने को कहा गया। परंतु उनके द्वारा इस संबंध में अबतक कोई स्पष्ट प्रतिवेदन नहीं दिया गया है। इससे प्रतीत होता है कि परिवादी के परिवाद में उनकी कोई अभिरूचि नहीं है। साथ ही बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015 अंतर्गत विषयों से संबंधित मामले में उनके द्वारा लापरवाही बरती जा रही है। परिवादी चाहें तो अपील में जा सकते हैं। इस निदेश के साथ वाद की कार्यवाही समाप्त की जाती है।

अब सबाल उठता है कि आखिर इस तरह के फैसले के मायने क्या हैं ? परिवादी चाहें तो अपील में जा सकते हैं- जैसी सलाह देने के पहले सक्षम पदाधिकारी ने लापरवाह लोक प्राधिकार के खिलाफ अधिनियम में प्रावधान के अनुसार कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। जबकि उन्हें निर्देश की बारबांर अवहेलना करने वाले किसी भी लोक प्रधिकार को शास्ति अधिरोपित कर दंडित करने की अनुसंशा करने का अधिकार प्राप्त है। जिसका उन्होंने अनुपालन नहीं किया।

दरअसल, राजगीर लोक जन शिकायत कार्यालय के वर्तमान पदाधिकारी मृत्युजंय कुमार के बारे में आम शिकायत है कि लोक प्राधिकार के सामने ज्ञान-अधिकार सब लुप्त हो जाती है और हर परिवाद में कुछ न कुछ खेला करने में जुट जाते हैं। ऐसे पदाधिकारी के रहते  बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम-2015  का क्या हश्र होगा, जग जाहिर है।  

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