बड़गांव में इस बार नहीं होगा सूर्य महोत्सव का आयोजन, जानिए क्यों?

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एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क। नालंदा जिला का विश्व प्रसिद्ध सूर्यपीठ बड़गांव में इस बार सूर्य महोत्सव नहीं मनाया जाएगा। यह निर्णय “राजगीर बबुनी गैंगरेप” से आहत सूर्योत्सव के आयोजकों ने सर्वसम्मति से लिया है।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्मृति न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार………………..

उक्त जानकारी देते हुए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्मृति न्यास के अध्यक्ष नीरज कुमार ने बताया कि वे राजगीर गैंगरेप की वारदात को लेकर काफी मर्माहत हैं। आत्मा गवारा नहीं किया कि इस बार सूर्य महोत्सव मनाया जाए।

इस महोत्सव से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार राम विलास बताते हैं कि पिछले डेढ़ दशक से यहां महापर्व छठ के सुअवसर पर सूर्य महोत्सव का आयोजन होता आ रहा है। इस दौरान षष्ठी के दिन बड़ा साहित्यिक आयोजन होते रहे हैं। पिछली बार आयोजित कवि सम्मेलन में अनेक महान कवियों का जुटान हुआ था।

वे आगे बताते हैं कि बिहार में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ स्मृति न्यास द्वारा पहली बार बड़गांव में सूर्य महोत्सव का आयोजन किया गया था। इसी की देखादेखी देव में सूर्य महोत्सव का आयोजन किया गया। जिसे राजकीय महोत्सव का दर्जा प्राप्त हो गया है। लेकिन बड़गांव सूर्य महोत्सव शासकीय उदासीनता का शिकार बन कर रह गई।

वे कहते हैं कि सूर्य महोत्सव से दूर-दूर से आने वाले छठ श्रद्धालुओं को बहुत राहत मिलती थी। उन्हें रात भर एक मनोरंजक आशियाना मिलती थी। उनमें साहित्यिक-बौद्धिक  चेतना भी मिलती थी। 

दरअसल, विश्व के 12 अर्कों (सूर्य मंदिर) में से बड़गांव एक है। यहां देश के कोने-कोने से श्रद्धालु छठव्रत करने के लिए आते हैं। मान्यता है कि यहां छठ करने से मुरादें पूरी होती हैं।

बड़गांव का प्राचीन नाम बर्राक है। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के पौत्र राजकुमार साम्ब का ऋषि दुर्वासा के श्राप से कुष्ठ रोग हो गया था। बड़गांव के तालाब में स्नान करने से उन्हें रोग से मुक्ति मिली थी।

कई वर्षों तक यहां रहकर उन्होंने यहां सूर्योपासना की थी। मंदिर के पुजारी भुनेश्वर पांडेय ने बताया कि पहले सूर्य मंदिर तालाब के पास में ही था। वर्ष 1934 में भूकंप के कारण घ्वस्त हो गया। जिसका फिर से नवनिर्माण कराया गया।

पूरी पौराणिक मान्यताओं के कारण देश के कोने-कोने छठव्रती बड़गांव आते हैं। यहां छठ करने से मुरादें पूरी होती है।

यहां पहली बार नागकन्या ने किया था छठव्रत। कहा जाता है कि नाग कन्या ने अपने पति च्यवन के दुखों का निवारण के लिए पहली बार छठव्रत रखा था। इसकी चर्चा पुराणों में है।

इसके बाद पांडवों के वनवास के समय ऋषि धौम्य के आदेश पर द्रोपदी ने विध्नों से छुटकारा पाने के लिए छठव्रत किया था। तब से लोग छठव्रत के गुणों को जाने। उसके बाद आम लोगों ने भी छठव्रत करना शुरू कर दिया।

यह पर्व प्राचीन काल से ही समरसता एवं सामाजिक सौहार्द का प्रतीक है। बिना भेदभाव के छठपर्व को सभी वर्ण के श्रद्धालु एक साथ एक घाट पर अर्घ्य देते हैं। बड़गांव का छठ सामाजिक सद्भाव का अद्भुत मिसाल मानी जाती है। यहां किसी तरह का कोई जात-वर्ग भेदभाव नहीं होता है। हर तबके के लोग आपस में एक दूसरे की सेवा करते हैं।

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