नेताओं-अफसरों पर लगाम के लिए बने पब्लिक प्रेशर ग्रुप

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बीजेपी को हिन्दू राष्ट्र बनाना है। कांग्रेस को राहुल गांधी बचाना है। लालू जी को अपना परिवार सुरक्षित करना है। नीतीश जी को चेहरा चमकाना है। और जनता की मजबूरी है कि इनमें से ही किसी एक को चुनना है। और जो सत्ता में आता है, यही करता है……………”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क। सप्ताह भर से अधिक समय हो गया। बिहार की राजधानी पटना के कई इलाकों में अब भी पानी भरा है। नगर निगम अब जब नालों का नक्शा ढूँढने निकला, तो पता चला है नक्शा गायब है। अब आरोप प्रत्यारोप का दौर चलेगा। अपेक्षाकृत कमजोर कर्मचारी सस्पेंड होंगे, मज़बूत सारे लोग फ्रेश होकर बाहर निकल आयेंगे।

लेकिन लापरवाही की हद देखिये, नाले की सफाई के लिए नक्शा ढूंढा जा रहा है। इसका साफ़ मतलब है कि सालों से नालों की सफाई नहीं हुई है। इतने समय से कि किसी कर्मचारी या अधिकारी को पता नहीं है कि नाले की दिशा क्या है। ये घोर लापरवाही का अतुलनीय नमूना है।

पटना निगम निगम हर महीने करोड़ों रुपये का टैक्स वसूलता है। रिश्वत के तौर पर भी करोड़ों की वसूली होती होगी सो अलग। अफसरों की बहाली और विदाई भी समय समय पर होती होगी, चुनाव भी होते ही रहते हैं नगर निगम के। नए घर भी बनते रहते होंगे, लेकिन किसी को नाले की हालत की फ़िक्र नहीं है। न जनता को, न कर्मचारी को और ना ही जनप्रतिनिधि को।

सब मस्त हैं और अगर बारिश ने हमला न बोला होता तो किसी को पता भी नहीं होता कि पीएमसी किस तरह काहिलों का अड्डा बना है और जनप्रतिनिधि लूटने के लिए नगरसेवक, मेयर और नगर विकास मंत्री बनकर कुर्सी का सुख भोगने में तल्लीन हैं।

इस तरह देखें तो पटना के साथ भारी अनाचार और अत्याचार हुआ है। खबर तो ये भी है कि याचिकाओं पर पटना हाईकोर्ट ने भी कई बार पटना नगर निगम को आदेश दिया है कि सफाई करें, लेकिन किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगा।

देश का तंत्र किन लोगों के हाथों में है और किस हाल में है। ये जानने समझने का सबसे भयानक उदाहरण है। अब जब राजधानी पटना का ये हाल है तो बिहार के बाकी शहरों का क्या हाल होगा, सहज कल्पना की जा सकती है।

यानी पूरे बिहार में अकर्मण्यता और लूट का साम्राज्य है। यहां ये भी समझ लीजिये। पटना के जिन इलाकों की अब तक बुरी हालत है। वो कोई झोपड़पट्टी या गरीबों का इलाका नहीं है। इन इलाकों में बिहार के पुराने अमीर लोग रहते हैं।

डॉक्टर, व्यापारी, जज आदि तरह तरह के ताकतवर लोग रहते हैं। अनगिनत बंगलें हैं। बड़ी बड़ी दुकानें हैं। क्लीनिक्स हैं।  बिल्डिंग्स हैं, फ्लैट्स हैं। आश्चर्य हो रहा है न कि फिर ऐसी दारुण हालत क्यों ?

अंदाजा लगाइए हम आम और ख़ास लोग व्यवस्था को लेकर कितने स्थितप्रज्ञ या कहें चेतना शून्य हो गए हैं। हमें कोई फर्क नहीं पड़ता कौन क्या कर रहा है। सब अपने आप में तल्लीन और मस्त हैं।

पटना वासियों को इस पर विचार करना चाहिए और विचार करना चाहिए स्वनाम धन्य राजनीतिज्ञ नीतीश कुमार को भी। लालू प्रसाद को तो बिहार के आम शहरियों ने नकारा मानकर किनारे कर ही दिया था। जिस नीतीश कुमार को समझदार कहकर सालों से गद्दी पर बिठाया हुआ है, उन्होंने क्या सोचा पटना और बिहार के लिए।

सिर्फ पटना को राज्य से जोड़ने के लिए सड़के बना देना और ट्रैफिक को सहज बनाने के लिए ओवरब्रिज बना देना विकास नहीं है। उससे ज्यादा ज़रूरी है शहर की व्यवस्था की हालत को देखना कि शहर का आतंरिक हाल क्या है।

नीतीश कुमार के समर्थक कह सकते हैं कि पटना नगर निगम बीजेपी के कब्ज़े में है। विधायक और सांसद सब बीजेपी के हैं, इसलिए जिम्मेदारी उन सबकी है, लेकिन क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री होने के नाते उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है ?

हालांकि आम शहरियों की भी कम जिम्मेदारी नहीं है। क्योंकि वे उसके लिए गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा टैक्स के तौर पर भरते हैं। और रोज़ दुःख वही झेलते हैं।

मंत्री जी के लिए तो शहर की ट्रैफिक व्यवस्था रोक दी जाती है या डायवर्ट कर दी जाती है, लेकिन आम आदमी रोज़ गाड़ियों के घुएं में झुलसता है। वह रोज़ कराहता है कि टैफिक की हालत बड़ी खराब है। आधे घंटे की यात्रा पूरी करने में दो दो घंटे का वक्त लग जाता है। भारी थकान हो जाती है, समय की बर्बादी होती है सो अलग।

ये देश की लगभग हर शहर की हालत है। लेकिन पटना में आज जो विपत्ति है सप्ताह से अधिक समय से, उसमें क्या रोजी रोजगार सहज चल रहा है ?  सब के सब भुगत रहे हैं। हिन्दू हों कि मुसलमान, ब्राह्मण हों कि बनिया। क्या सबको मिलकर घुन लग चुकी व्यवस्था के खिलाफ उठा खडा नहीं होना चाहिए।

कुछ नहीं तो सामूहिक तौर पर व्यवस्था और हालात के खिलाफ एकजुट होकर कोर्ट में याचिका तो दायर तो कर सकते हैं। चुनाव के समय सबका बहिष्कार तो कर सकते हैं। म्युनिसिपल दफ्तरों पर निगरानी तो रख सकते हैं।

कहा गया गया है संघ शक्ति कलियुगे। नेता ताकतवर इसलिए हैं कि उनका संगठन है, अफसर-कर्मचारी ताकतकवर इसलिए हैं कि उनका संगठन है। आम आदमी अपना संगठन क्यों नहीं बना सकता ?

राजनीतिक सोच से अलग सिर्फ सामाजिक कार्यों के लिए। और वह देखे कि नाले की सफाई हुई या नहीं ? बिजली और सड़क की हालत दुरुस्त है या नहीं ? पानी की टंकी और पाइप दुरुस्त है कि नहीं?  मुझे लगता है अब समय आ गया है जब पब्लिक प्रेशर ग्रुप बनाया जाय, ताकि नेताओं और अधिकारियों पर लगाम रखा जा सके।

नेताओं का हाल तो हम देख रहे हैं। क्या कांग्रेस, क्या लालू, क्या नीतीश और क्या बीजेपी सबका एक हाल है। सबका एक एजेंडा है। जनता को बेवकूफ बना सत्ता में आना और फिर सत्ता सुख भोगना।

बीजेपी को हिन्दू राष्ट्र बनाना है। कांग्रेस को राहुल गांधी बचाना है। लालू जी को अपना परिवार सुरक्षित करना है। नीतीश जी को चेहरा चमकाना है। और जनता की मजबूरी है कि इनमें से ही किसी एक को चुनना है। और जो सत्ता में आता है, यही करता है।

ऐसा क्यों? अब तो राजनीतिक पार्टियां भी जान गयी हैं कि जनता को एक नारा थमा दो, वो खुश हो जाती है। देश खतरे में है। भारत मुसलमानों के कब्ज़े में चला जाएगा। आरक्षण ही आगे बढ़ाएगा। आरक्षण ही देश को बर्बाद कर रहा है। सरकारी कम्पनियां भ्रष्टाचार में डूबी हैं। निजीकरण ही हल है आदि आदि। टैक्स बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन आदमी का जीवन मुश्किल होता जा रहा है।

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