नीतीश के पूर्व भागवत झा आजाद के खिलाफ उबला था जनाक्रोश

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संयोग कि 12 तारिख को ही तत्कालीन मुख्यमंत्री के मुंह पर पोती थी कालिख । लेकिन…. उस अक्रोश का मतलब अलग था, इस आक्रोश का मतलब अलग है । ”

-: विनायक विजेता :-

पटना। राज्य में छठी बार मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार के खिलाफ जनाक्रोश धीरे-धीरे बढ़ता दिख रहा है। यूं तो पूर्व की कई यात्राओं में सीएम को काले झंडे दिखाए गए और उनके खिलाफ नारेबाजी की गई।

पर बीते 12 जनवरी को सीएम की समीक्षा यात्रा के दौरान बक्सर के नंदन गांव की सड़कों पर जो हुआ वह अप्रत्याशित था। भले ही सत्ताधारी दल इसे विपक्ष की साजिश मानता हो, पर इसे साजिश नहीं माना जा सकता।

नीतीश कुमार के काफिले पर पत्थर चलाने वाले वैसे महिला, पुरुष और युवा थे जो विकास के कथित ढिढोंरे पीटने वाली इस सरकार में अब भी विकास से वंचित हैं।

मेरी याद में अब तक बिहार में सिर्फ दो ही मुख्यमंत्रियों को जनता की तरफ से ऐसे अपमान का सामना करना पड़ा है।

11 अगस्त 1986 को जहानाबाद जिले के काको थाना अंतर्गत दमुहा-खगड़ी गांव में 11 लोगों की सामूहिक हत्या कर दी गई थी। इस हत्या को  इसी वर्ष इसी थाना क्षेत्र के नोनही-नगवां गांव में हुए 22 दलितों के नरसंहार का प्रतिशोध माना जा रहा था।

दमुहा नरसंहार के बाद 12 अगस्त 86 को तत्कालीन मुख्यमंत्री उस गांव में पीड़ितो से मिलने पहुचें, जहां आक्रोश में तत्कालीन आइपीएफ के एक युवा कार्यकर्ता विरेन्द्र विद्रोही ने भागवत झा आजाद के मुंह पर कालिख पोत दी थी।

बाद के वर्षो में विरेन्द्र विद्रोही की कूर्था बाजार में ही गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पर 12 की उस त्वारिख और 31 साल बाद फिर से 12 तारिख को बक्सर में ही उपजे आक्रोश में काफी अंतर और अगल-अलग मायने दिख गया।

विरेन्द्र विद्रोही का व्यक्तिगत आक्रोश तत्कालीन सिस्टम से था, न कि मुख्यमंत्री से था। जहां लगातार नरसंहार हो रहे थे। जबकि नीतीश कुमार के खिलाफ उपजा आक्रोश नीतीश के साथ उनकी प्रतिदिन बदलती नीती और नियत के खिलाफ दिख रही है।

3 मार्च 2000 से लेकर अब तक 6ठी बार और 36वें मुख्यमंत्री बने नीतीश बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डा. श्री कृष्ण सिंह के बाद अब तक सबसे ज्यादा दिनों तक मुख्यमंत्री पद पर हैं।

अब उन्हें यह विचार करना होगा कि उनकी नीती और नियत कहां गलत हो रही है, जिससे जनता में धीरे-धीरे आक्रोश पनप रहा है।

नीतीश कुमार की छवि एक इमानदार राजनेता के रुप में है। इसमें कहीं कोई शक नहीं।

पर बीते 8 वर्षों में उनकी सरकारी खर्चे पर लगातार विभिन्न यात्राओं पर हुए करोड़ों  के  खर्च उन्हें सवालों के कटघरे में जरुर लाता है।

आज से कुछ वर्ष पूर्व जब नीतीश कुमार अपने सरकारी आवास पर जनता दरबार लगाते थे तो राज्य के कोने कोने से हजारों फरियादी पहुंचते थे। अब भी लाखों की फरियाद इस दरबार से संबंधित कार्यालयों में धूल फंक रहा है।

2005 से 2010 तक के जिस काल को नीतीश काल का स्वर्णिम युग माना जा रहा था।  आखिर उस काल के बाद नीतीश कुमार के ऐसी क्या बेबसी हुई कि उन्हें बार-बार गठबंधन तोडने और जोड़ने पड़े।

कई राजनीतिक विश्लेष्को और रिटायर्ड वरीय अधिकारी भी यह मानते हैं कि ‘इतने वर्षों तक शासन करने के बाद भी नीतीश ने कोई संपत्ति अर्जित नहीं की, जबकि राजनति से धन का संबंध बहुत गहरा है।

ऐसे लोगों का मानना है कि अगर आने वाले दिनों में नीतीश कुमार की राजनीति का ग्राफ गिरेगा तो वह फिर से खड़ा नहीं हो पाएंगे।’

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