नालंदा : पाण्डुलिपियो की उद्गमभूमि – डा उमाशंकर

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नालंदा ( राम विलास )। नपांडुलिपियों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार नव नालंदा महाविहार डीम्ड विश्वविद्यालय में शनिवार को शुरू हुआ। पांडुलिपिविदो ने संयुक्त रुप से दीप जलाकर सेमिनार का उद्घाटन किया।

नव नालंदा महाविहार के पूर्व निदेशक डॉक्टर उमाशंकर व्यास ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि नालंदा पाण्डुलिपियो की उद्गम स्थल है। प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से प्राप्त लिखीत पांडुलिपियों से ही संपूर्ण एशिया में पाण्डुलिपि संस्कृति का प्रचार और प्रसार हुआ था।

उन्होंने कहा कि बिहार की पांडुलिपियाँ एशिया के बौद्ध देशों को समृद्ध किया है । ” मैन्युस्क्रिप्ट्स ऑफ बिहार एन रिच द एशियन बुद्धिज्म ” विषयक इस सेमिनार का उद्घाटन बौद्ध भिक्षुओं के मंगलपाठ से किया गया।

राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के निदेशक डा दिलीप कुमार कर ने कहा कि सेमिनार का मुख्य प्रयोजन लोगों को जागरूक करना है। उन्होंने भावी योजना की जानकारी देते हुए कहा कि मिशन द्वारा एक गुरूकुल खोलने की योजना बनाई जा रही है, जिसमें एक प्रशिक्षक और तीन शोधकर्ता (रिसर्च स्कॉलर) होंगे। ये बिहार की पाण्डुलिपियों के सूचीकरण, संपादन आदि करेंगे। उन्होंने नव नालंदा महाविहार डीम्ड विश्वविद्यालय में पाण्डुलिपि विज्ञान में सर्टिफिकेट और डिप्लोमा कोर्स की पढ़ाई कराने की आवश्यकता पर बल दिया।

समारोह के मुख्य अतिथि दिल्ली विष्वविद्यालय के डॉ. आर. के. राणा ने कहा कि बौद्ध परम्परा का प्रारम्भ और विकास बिहार से ही हुआ है । यहीं से पुरे एशियाई देशों में यह धर्म और परंपरा फैला है। उन्होंने कहा कि महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति बोधगया में हुआ। उनका कर्मक्षेत्र प्राचीन मगध अर्थात् बिहार ही था। इनके उपदेशो पर  प्रथम, द्वितीय और तृतीय संगीति और संगायन क्रमशः राजगृह, वैशाली, और पाटलिपुत्र में हुआ।

बौद्ध धर्म का विकास सम्राट अशोक के समय तक आते आते 18 निकायों में विकसित हो चुका था। सम्राट अशोक ने इसके विकास और प्रचार के लिए एशिया के विभिन्न देशों में यहाँ के बौद्ध भिक्षुओं को भेजा था। बाद में अनेक देशों के जिज्ञासु यहाँ आये और नालन्दा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया। अध्ययन उपरांत वे अपने साथ यहाँ से पाण्डुलिपियाँ भी ले गये। बाद में उसका अनुवाद उन्होंने विद्वानों ने अपनी भाषा में किया। जिससे उन देशों में बौद्ध धर्म का विकास व प्रसार हुआ। सेमिनार के

समन्वयक दर्शन शास्त्र विभागाध्यक्ष डॉ बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कहा कि इस सेमिनार के अधिकार को पाना नव नालन्दा महाविहार डीम्ड विश्वविद्यालय के लिए गर्व की बात है। यह प्रमाणित करता है कि यह प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय के करीब है ।

इस संगोष्ठि से बिहार की जिन पांडुलिपियो के संबंध में सामान्यतः शोधार्थी नहीं जानते हैं, उन्हें भी जानने व समझने का अवसर मिलेगा । इसका लाभ छात्रों को उन्हें शोध में मिलेगा । शोधार्थी के माध्यम से पांडुलिपि में छिपे ज्ञान का लाभ सामान्य लोग भी प्राप्त कर सकेंगे।

अकादमिक सत्र को डॉ. वी. के. सिंह, डॉ. प्रवीण कुमार, डॉ. विवेकानन्द बनर्जी, डॉ. शशिभूषण मिश्रा, डॉ. अनुपम जस, डॉ. सास्वतीमुत्सुद्धि, डॉ. जगतपति सरकार, डॉ के. के पाण्डेय एवं सुरेन्द्र कुमार मिश्रा आदि ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया।

आरंभ में विवि के रजिस्ट्रार डा एस पी सिन्हा ने आगत अतिथियों का स्वागत किया । विश्वविद्यालय के डीन ऐकडमिक डा श्रीकांत सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम का संचालन डा ललन कुमार झा ने किया। इस अवसर पर विवि के अध्यापक, शोधार्थी और छात्र बड़ी संख्या में मौजूद थे ।

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