जज राजीवः जीते जी जो न कर सके, उनकी लाश ने कर दिखाया

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“वेशक कुछ घटनाएं परिवार, समाज और व्यवस्था की ताजा हालात से रुबरु तो कराती ही है, सीधे इंसान के अंदर तक प्रहार करती है। नालंदा जिले के भोभी मदारपुर निवासी जज राजीव कुमार की मौत के बाद उत्पन्न परिस्थितियां काफी विषम है। क्योंकि इसमें कहीं न कहीं हम सब की अंतरात्मा दम तोड़ती साफ दिख रही है……..”

मुकेश भारतीय

सवाल जज राजीव कुमार की मौत की नहीं है और न ही उसके बाद हुई शासकीय हरकत या उभरे पारिवारिक कलह के आयाम की, मूल प्रश्न है कि इस घटना से जुड़े सारे पात्र खुद को क्या साबित करना चाहते हैं। जज भी किसी का पति, बेटा, भाई आदि ही होता है। उन्हें हम सामाजिक तौर पर विशेष आंकलन कर नहीं देख सकते।

अगर हम उसी ग्रामीण परिवेश से ताल्लूक रखते है, तो कदापि नहीं। हमारे लिए बांस-फूस, मिट्टी-खपरैल के मकान में रह कर खेत-खलिहान में अपना खून पसीना बहाने वाले भी उतने ही मायने रखने चाहिए, जितना कि उस माहौल से अलग-थलग बने कमरे में बैठ कर समाज-व्यवस्था को चलाने या उसका मार्गदर्शन करने वाले।

राजीव के बारे में गांव-जेवार तक के प्रायः लोगों को तब यह जानकारी मिली कि वे एक जज हैं, जब उनका पार्थिव शरीर लेकर पुलिस बल के साथ उनकी पत्नी पहुंची। उसके पहले उनके खास करीबियों-रिस्तेदारों के आलावे अमुमन लोग यही मान रहे थे कि मदारपुर का  एक लड़का वकालत की पढ़ाई करके कहीं अपने बीबी-बच्चों के साथ कमा-खा रहा है।

जब मीडिया में जज राजीव की मौत को लेकर सूचनाएं वायरल हुई तो उसके विवरण काफी चौंकाने वाले थे। हमने इसकी पड़ताल की। हमें कई वीडियो-ऑडियो क्लीप के साथ शिकायत की कॉपी उपलब्ध कराई गई। उसके विश्लेषण के बाद हमारी एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क की टीम ने सारे……….(जारी……. शेष अगले किश्त में पढ़ें।)

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