खुलासाः मीडिया, मॉब लिंचिंग, तबरेज और मौत!

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-: एक्सपर्ट मीडिया न्यूज नेटवर्क :-

झारखंड प्रांत के सरायकेला-खरसावां जिले के धातकीडीह गांव में हुए 22 जून की घटना ने सरायकेला खरसावां जिला को दुनिया के नक्शे कदम पर बदनाम कर दिया। इस जिले को बदनाम करने के लिए वास्तव में जिम्मेदार कौन है, ये जानना जरूरी है।

देश दुनिया की मीडिया ने जिस तरह से टीआरपी के लिए चीख-चीखकर तबरेज की मौत को मॉब लिंचिंग से जोड़ दिया है और झारखंड के इस जिले को सड़क छाप रिपोर्टिंग के आधार पर सदन में प्रधानमंत्री को इस घटना पर बोलने को मजबूर कर दिया, उससे कई सवाल उठ खड़े हुए हैं।

यहां ये जानना जरूरी है, कि क्या वाकई तबरेज की मौत भीड़ की पिटाई से हुई है?  क्या तबरेज की पिटाई के दौरान वास्तव में उससे धर्म विरोधी नारे लगवाए गए? जिसको लेकर इतना हंगामा खड़ा किया गया ! क्या वाकई तबरेज उसका हकदार है?  क्या तबरेज का किसी ने इतिहास जानने का प्रयास किया?

ऐसे सभी सवालों का  जवाब आज भी यक्ष प्रश्न बनकर रह गया है। क्या इन बिंदुओं पर बड़े-बड़े मीडिया घरानों को तार्किक जवाब देना जरूरी नहीं?  क्या टीआरपी के चक्कर में जिले के सौहार्द को बिगाड़ने का काम नहीं किया गया।

वैसे पूरे मामले में सबसे पहला दोषी स्थानीय पुलिस-प्रशासन है। ऐसा राज्य पुलिस महानिदेशक का मानना है। सही हो सकता है। मगर उनके तर्क और हमारे आंकलन का नजरिया अलग-अलग हो सकता है।

हमने अपने सूत्रों से जो जानकारियां और आंकड़े जुटाए हैं, वो बेहद ही चौंकानेवाले हैं। हमारे सूत्र बताते हैं कि तबरेज एक प्रोफेशनल अपराधी था, जो अपने पिता के नक्शेकदम पर चल रहा था।

तबरेज का पिता अपने साथी के साथ राजनगर थाना अंतर्गत तियालगोडा-कुनबेड़ा के बीच मारा गया था। करीब 17 साल पूर्व की एक घटना अचानक से ताजा हो गई है।

बताया जाता है कि एक बूढ़ी महिला बैंक से पैसे निकालकर जा रही थी इसी बीच तबरेज का पिता मशकुर आलम अपने एक साथी के साथ महिला के पैसे छीनकर भागने लगा।

इसी बीच स्थानीय लोगों ने दोनों का पीछा किया। जहां दोनों एक स्थानीय होटल में छिपकर जान बचाने का प्रयास किया। लेकिन भीड़ ने दोनों की हत्या कर दी और मोटरसाइकिल को आग के हवाले कर दिया। उस वक्त तबरेज के परिजनों ने किसी तरह की कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी।

इस घटना में हाय तौबा मचाने सबसे पहले पहुंचे कांग्रेसी नेता जरा इस सवाल का जवाब देते कि उनके सरायकेला खरसावां के वर्तमान जिला अध्यक्ष उस घटना में क्या भूमिका निभाई थी?  क्या उन्होंने तबरेज के पिता के लाश को अपने कंधों पर नहीं लाया था?  फिर मीडिया के सामने कांग्रेस विधवा विलाप क्यों कर रही?

यहां स्थानीय पुलिस पर भी सवालिया निशान खड़ा होता है कि देश के प्रधानमंत्री सदन में झारखंड को लेकर चिंता जाहिर कर रहे होते हैं  और सरायकेला-खरसावां पुलिस 17 साल पहले की घटना मीडिया के सामने ला पाने में असमर्थ रही।

अगर सरायकेला-खरसावां पुलिस प्रशासन उस घटना से सरकार और स्थानीय मीडिया को रूबरू करा देती तो शायद इस घटना को मॉब लिंचिंग से जोड़कर नहीं देखा जाता।

वैसे हमारे सूत्र यह भी बताते हैं कि तबरेज घटना से पहले अपने कुछ साथियों के साथ अपने ही किसी रिश्तेदार का दुष्कर्म कर पुणे भाग गया था। परिजन जिस तबरेज को पुणे में नौकरी करने की बात बता रहे हैं।

दरअसल वह नौकरी करने नहीं गया था, बल्कि दुष्कर्म के बाद पुणे छिपने गया था। सरायकेला-खरसावां पुलिस इस मामले में भी अब तक जांच नहीं कर पाई है। इसे भी जिला पुलिस की किरकिरी का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।

तबरेज के साथ दो और साथी होने का दावा किया जा रहा है, आखिर वो दोनों साथी है कहां ? क्या उसे जमीन निगल गई या आसमान खा गया ? आखिर उसका सुराग पुलिस घटना के 10 दिनों बाद भी क्यों नहीं लगा पा रही ?

जबकि, चोरी करने के प्रयास करने के दौरान पकड़े जाने के बाद तबरेज की गांव वालों ने पिटाई की। फिर पुलिस को सूचना दी। पुलिस रात भर थाना क्षेत्र सीमा विवाद में उलझी रही। सुबह आई और चोरी का मुकदमा दर्ज करते हुए उसे जेल भेज दिया। जेल भेजे जाने तक उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि 2-4 दिनों में ही उसकी मौत हो जाए। इसकी पुष्टि पुलिस-जेल सूत्रों के साथ स्थानीय मीडिया द्वारा सामने आई तस्वीरे भी साफ स्पष्ट करती है।

हमारी एक्सपर्ट मीडिया न्यूज टीम की पड़ताल में सूत्रों से यह भी जानकारी मिली कि तबरेज ड्रग एडिक्ट था। जेल में उसके शरीर को ड्रग नहीं मिला तो उसका ब्रेन हेमरेज हो गया। जेल सूत्रों के अनुसार अन्य कैदियों ने तबरेज को जेल वार्ड में एक अजीब तलब को लेकर अकुलाते देखा और उसके बाद अचानक वह वेहोश होकर गिर पड़ा।

बाद में उसे स्दर अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। मौत की खबर मिलते ही उसके परिजन सदर अस्पताल पहुंचे और डॉक्टरों के दावे के विपरित तबरेज का शव गर्म और उसकी सांसे चलने की बात कहकर हंगामा मचाने लगे। स्थिति बिगड़ती देख उसे पुलिस की निगरानी में एमजीएम जमशेदपुर अस्पताल भेजा गया। वहां उसे तत्काल मृत घोषित कर दिया गया।  

ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब मिलते ही पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठ जाएगा। लेकिन घटना को मॉब लिंचिंग से जोड़कर देखने वालों के लिए हम कुछ सवालों का जवाब जानना चाहते हैं कि आखिर तबरेज अपने दो साथियों के साथ इतनी रात को वहां क्या कर रहा था।

 जिस वीडियो में धर्म विरोधी नारे लगाने के लिए बाध्य करने का दावा किया जा रहा है, उस वीडियो में तबरेज का लिप आउट हो रहा है तो क्या उसे सच मान लिया जाए ? जबकि उसी वीडियो में तबरेज अपने दो साथियों को किसी मकान में घुसने की बात बता रहा है तो उस वीडियो को सच क्यों नहीं माना जाए?

जब स्थानीय सरायकेला पुलिस कांड संख्या 74/ 19 में यह दावा कर रही है कि तबरेज को उन्होंने गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी करते हुए 17 जून की संध्या 6:19 में चोरी की मोटरसाइकिल, चाकू, पैन कार्ड, मोबाईल वगैरह के साथ गिरफ्तार किया है  और उसे सुरक्षित न्यायिक हिरासत में भेजा है तो फिर मॉब लिंचिंग कैसे हुआ?

सरायकेला मंडल कारा में 18 तारीख से लेकर जिस दिन तक तबरेज रहा, उसका वीडियो फुटेज, मुलाकातियों के साथ किस तरह से मिला किंतना दर्द हो रहा था। ऐसे सभी पहलुओं पर स्थानीय प्रशासन को सरकार को खुलकर बतानी चाहिए। खासकर बाहरी मीडिया को जरूर।

वैसे यहां तबरेज के खानदानी अपराधी होने का एक और मामला प्रकाश में आया, जब तबरेज की बेवा को सहानुभूति फंडिंग हो रही थी। उसी दौरान उसका चाचा करीब सात लाख रुपए चुपके से दबाने का प्रयास करते रंगे हाथ धराया था, जो साबित करता है कि पूरे मामले में तबरेज को हीरो बनाकर उसकी आड़ में क्या खेल खेलने का प्रयास कुछ लोग कर रहे हैं।

वैसे अनुसंधान के क्रम में सारी बातों का खुलासा जरूर होगा। लेकिन उसके पहले सब कुछ लुट चुका होगा। क्योंकि जिले के कुछ ऐसे अधिकारी हैं, जिन्हें सरकार की छवि से कोई लेना देना नहीं।

कभी उन्होंने खुलकर ऐसे संवेदनशील मामलों में स्थानीय मीडिया का साथ नहीं दिया। यही कारण है कि बाहरी मीडिया बाहरी फंडिंग के माध्यम से यहां पहुंचकर एक तरफा रिपोर्टिंग करके स्थानीय प्रशासन को और राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।

वैसे फंडिंग मीडिया की करतूतों के कारण देश के प्रधानमंत्री को भी सदन में झारखंड का पक्ष लेने को मजबूर कर दिया।

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