कहीं देखा है छह लाख से निर्मित ऐसा आंगनबाडी भवन केन्द्र

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” सवाल यह उठता है कि लाखों खर्च के बाद भी आंगनबाडी केन्द्र बदहाल रहे और फिर से लाखों की राशि जीर्णोद्धार के नाम पर फूँक दिया जाए, उस पर पदाधिकारियों की नजर न जाए तो क्या सरकारी योजनाओं का यही हश्र होता रहेगा, योजनाएँ लूट की भेंट चढती रहेगी?”

चंडी (संजीत कुमार)। नालंदा जिले में सरकारी राशि और पंचायतों की योजनाओं का क्या हश्र होता है, इसका नजारा देखना हो तो चंडी प्रखंड में लाखों की राशि से निर्मित इस आंगनबाडी केन्द्र का भवन देख लीजिए। शायद यह अपने आप में एक अजूबा है। जनप्रतिनिधियों की काली करतूत का एक नमूना है। वो जनप्रतिनिधि, जिसे जनता पंचायत के विकास के लिए चुनती है। लेकिन गाँव-जेवार का विकास करने के बजाय विनाश में लग जाते हैं ।

चंडी प्रखंड के हसनी पंचायत में वर्षों पूर्व पहले बनी आंगनबाडी केन्द्र आज भी आधा – अधूरा पंचायती राज व्यवस्था को मुँह चिढ़ा रहा है । बच्चे आंगनबाडी केन्द्र तो जाते है, लेकिन भ्रष्टाचार के फर्श पर ही बैठकर ज्ञान के अक्षरों को समझ रहे हैं । वह भी मिट्टी के गड्डे नुमा फर्श पर।

यह एक ऐसा आंगनबाडी केन्द्र है,  जहाँ न तो खिड़की है और न ही दरवाजे। सिर्फ ईटों को खड़ा कर छत का रूप देकर आंगनबाडी भवन खड़ा कर दिया गया । न प्लास्तर, न ही कोई पहचान नाम है इस आंगनबाडी केन्द्र का।

ग्रामीणों ने बताया कि हसनी  पंचायत के पूर्व मुखिया के समय में यह आंगनबाडी केन्द्र का निर्माण हुआ था । लगभग पौने छह लाख की राशि खर्च कर दी गई । लेकिन न तो आंगनबाडी केन्द्र पर प्लास्टर चढ़ा और न ही खिड़की दरवाजे ही लगे। हसनी पंचायत के वार्ड नम्बर चार में बना यह आंगनबाडी केन्द्र गाँव के तालाब में बना हुआ है।

 इस आंगनबाडी केन्द्र में 40 बच्चे नामांकित है। यहाँ आने वाले बच्चे हमेशा खतरे से घिरे रहते हैं । फर्श और भवन का प्लास्टर नहीं होने से बराबर सांप -बिच्छू का खतरा मंडराते रहता है। बरसात में तो आंगनबाडी केन्द्र टापू बन जाता है ।ऐसे में कई महीने बच्चे केन्द्र ही नहीं जाते। यह केन्द्र आवारा पशुओं और अराजक तत्वों का अड्डा बना रहता है।

हसनी पंचायत के वर्तमान मुखिया श्रवण पंडित ने बताया कि आंगनबाडी भवन को नए सिरे से जीर्णोद्धार की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। लेकिन सवाल यह उठता है कि लाखों खर्च के बाद भी आंगनबाडी केन्द्र बदहाल रहे और फिर से लाखों की राशि जीर्णोद्धार के नाम पर फूँक दिया जाए, उस पर पदाधिकारियों की नजर न जाए तो क्या सरकारी योजनाओं का यही हश्र होता रहेगा, योजनाएँ लूट की भेंट चढती रहेगी?

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