एक ‘ईमानदार कोशिश’ ने बिहार शरीफ पर्यवेक्षण गृह की यूं काया बदल दी

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वेशक एक ईमानदार कोशिश किस तरह अपराधियों के मनोवृति में भी बदलाव ला सकता है इसे नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ में अवस्थित बाल पर्यवेक्षण गृह में देखा जा सकता है, जोकि बिहार-झारखंड राज्य में फिलहाल इकलौता नजर आ रहा है…”

एक्सपर्ट मीडिया न्यूज डेस्क। दीप नगर अवस्थित बिहार शरीफ़ पर्यवेक्षण गृह में विधि विरुद्ध बाल एवं किशोर बंदियों के मनोभाव तेजी से बदल रहे हैं। उनकी जीवनशैली और सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है। जिसका उदाहरण है कि यहां रह रहे बाल बंदी मौका मिलने पर भी फरार होने की कोशिश नहीं कर रहे हैं।

यही नहीं, यहां से जाने के बाद भी यहां के न्यायिक पदाधिकारी और कर्मियों के संपर्क में रह कर यह जानकारी देते रहते हैं कि वह यहां से निकलकर क्या कर कर रहे हैं।

बतौर उदाहरण यहां से निकलने के बाद एक बाल बंदी बीटेक की पढ़ाई कर रहा है। उसने खुद फोन कर सभी को बताया है कि उसे सेकेंड सेमेस्टर में 80 प्रतिशत अंक मिला है। यह सब संभव हो रह है यहां चलाये जा रहे सुधारात्मक कार्यक्रमों से।

आम तौर पर यह धारणा बनी हुई है कि पर्यवेक्षण गृह से बाल-बंदी एक दूसरे से और भी तरह के अपराध के तरीके सीख कर निकलते हैं। लेकिन यहां ऐसी कोई बात नहीं।

यहां रह रहे बाल-बंदियों के मनोभाव में गीत संगीत, मेडिटेशन, स्किल डेवलपमेंट, पढ़ाई, हैंडीक्राफ्ट, खेती-बारी, बागवानी, मछली पालन जैसी गतिविधियों से जोड़ कर परिवर्तन लाया जा रहा है।

उन्हें खाने-पीने,खेलकूद, सहित हर वह सुविधाएं दी जा रही हैं, जो उन्हे घर में ही मिल पाती। बागवानी, मछली पालन जैसे काम भी वह कर रहे हैं। कपड़े सिलने से लेकर कैंडल, फर्नीचर और खिलौने बनाने तक का हुनर यहां के बच्चे सीख चुके हैं। फिलहाल यहां कुल 44 बाल बंदी रह रहे हैं जिसमे 9 नवादा के हैं।

यहां संगीत शिक्षक की जरूरत है। जेजेबी द्वारा शिक्षा विभाग से उपलब्ध कराने के लिए लिखा गया है। पहले सप्ताह में एक दिन डॉक्टर विजिट करते थे। विगत 2 माह से विजिट बंद है। इसके लिए भी स्वास्थ्य विभाग को कहा गया है।

गार्ड के लिए रूम गेट को लेकर भवन निर्माण विभाग को कहा गया है। लेकिन कोई पहल नही हो रही। यहां अधीक्षक सहित कुल 29 कर्मी कार्यरत हैं।

नालंदा जिला बाल किशोर न्याय परिषद के प्रधान दंडाधिकारी सह अपर न्यायकर्ता मानवेन्द्र मिश्र कहते हैं’ ‘एक राष्ट्र और समाज के तौर पर हमें अपनी कमियों को भी देखना पड़ेगा और जरूरत के हिसाब से इसका निदान भी करना पड़ेगा। किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण तथा व्यवहार के निर्धारण में वातावरण का बहुत हाथ होता है। हमारा मुख्य ध्यान किशोर के मामले में अपराध पर नहीं बल्कि अपराध के कारणों पर होना चाहिए’।

श्री मिश्र का मानना है, ‘एक प्रगतिशील लोक कल्याणकारी जनतंत्र होने के नाते हम अपराध में संलिप्त अपने किशोरों को कड़ी सजा देकर उन्हें वयस्क अपराधियों के साथ जेल में नहीं डाल सकते। तरीका कोई भी हो हमें उन्हें सुधार प्रक्रिया से गुजार कर समाज की मुख्यधारा से जोड़ना होगा’।

इस वर्ष यहां रह रहे 6 किशोर इंटर और 5 मैट्रिक की परीक्षा में शामिल हुए हैं। बिना गार्ड की निगरानी के ये सामान्य छात्रों की तरह परीक्षा देने जा रहे हैं और वापस भी लौट रहे हैं।

एक और किशोर के घर में शादी थी। जेजेबी की अनुमति से शादी समारोह में गया और तीन दिन बाद खुद ही वापस लौट आया। इनमें से कुछ पर गंभीर आरोप भी हैं। यही नहीं पिछले साल तीन बंदी फरार भी हो गए थे।

कुछ ही दिन बाद खुद ही न्यायाधीश श्री मिश्र से संपर्क साधा और वापस लौट आये। कैंपस के अंदर भी घूमने फिरने की ठीक उसी तरह की आजादी है जिस तरह की आजादी एक ओपेन जेल में होती है।

बहरहाल, जिस तरह से पर्यवेक्षण गृह एक मॉडल का रूप लेता जा रहा है, उसके पीछे न्यायिक पदाधिकारी और वहां के कर्मियों का संवेदनशील व्यवहार व ईमानदार प्रयास है। किशोर न्याय परिषद के प्रधान दंडाधिकारी मानवेंद्र मिश्र खुद व्यक्तिगत रूप से वहां जरूरी सुविधाओं से नजर रखते हैं।

एक-एक बाल बंदी का उनसे सीधा संपर्क है। बच्चों की पढ़ाई, खाने-पीने, मनोरंजन आदि की एक-एक जरूरतों को वह व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखकर उसकी व्यवस्था कर रहे हैं। समय-समय पर मोटिवेशनल क्लास भी लेते हैं।

लेकिन यहां संगीत शिक्षक नहीं है। यहां के कर्मी यू ट्यूब की सहायता से इन्हें हरमोनियम,तबला आदि सिखाने की कोशिश कर रहे हैं। म्यूजिक सिस्टम पर गाना बजा कर डांस भी सीख रहे हैं।

जिला जज श्याम किशोर झा भी पर्यवेक्षण गृह का विजिट कर चुके हैं। यहां के कर्मी भी बाल-बंदियों के साथ परिवार जैसा व्यवहार कर रहे। जिसका नतीजा है कि बच्चों के व्यवहार में काफी तेजी से बदलाव आ रहा है। (इनपुटः दैनिक भास्कर)

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