उठने लगी राजगीर मलमास मेला को ‘राजकीय मेला’ का दर्जा देने की माँग

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नालंदा ( राम विलास)। बंदोबस्ती के बाद  राजगीर के सुप्रसिद्ध मलमास मेला को राजकीय मेला का दर्जा देने की मांग उठने लगी है। पार्टी, जाति और वर्ग भेद से ऊपर उठकर  सभी लोग इस मांग के समर्थन में उतर  आये  हैं।

राजगीर का यह मेला कब से लगता है। यह किसी को सही-सही पता नहीं है। लेकिन हिंदू धर्म ग्रंथों के अलावे जैन और बौद्ध साहित्य में इस मेले की चर्चा मिलती है। इससे पता लगता है कि यह मेला पौराणिक काल से लगते आ रहा है।

यह मलमास मेला हर ढाई से तीन साल पर लगता है। इस मेले में भारत के कोने-कोने से तीर्थयात्री और श्रद्धालु तो आते ही हैं विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।

मलमास मेला के दौरान यहां के गर्म जल के कुंडो में स्नान करने का वही महत्व है, जो प्रयाग और उज्जैन तीर्थ  में स्नान करने का है। पूरे भारतवर्ष में केवल राजगीर में ही मलमास मेला का आयोजन किया जाता है। इसे ‘पुरुषोत्तम मास’ के नाम से भी जाना जाता है।

“राजगीर का मलमास मेला राष्ट्रीय मेला है। देश  में और कहीं मलमास मेला का आयोजन नहीं होता है।

इस मेले का अपना धार्मिक महत्व है। दुनिया का शायद यह एकलौता मेला है,  जहां  33 करोड़ देवी देवता पधारते हैं।

ऐसे मेला को राष्ट्रीय मेला नहीं तो राजकीय मेला का दर्जा तो मिलना ही चाहिए। ….नीरज कुमार, अध्यक्ष, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर स्मृति न्यास

किवदंती और मान्यता है कि इस मलमास मेले में 33 करोड़/कोटि देवी – देवता राजगीर पधारते हैं। मेला अवधि में एक महीने तक यहीं  विराजते हैं। यह मलमास मेला हिंदुओं का मेला है।

इस मेले में यज्ञ, हवन, धार्मिक प्रवचन, स्नान के अलावे पिंडदान आदि किए जाते हैं। मेले में मनोरंजन की भी भरपूर व्यवस्था होती है।

“राजगीर का मलमास मेला राजकीय मेला के शर्तों को पूरा करता है। धार्मिक महत्व के इस मेले को राजकीय मेला का दर्जा नहीं देना केवल मेला के साथ ही नहीं बल्कि अध्यात्म के प्रति नाइंसाफी है।

देवघर के श्रावणी मेला, देव और बड़गांव के छठ मेला को राजकीय मेला का दर्जा मिल सकता है, तो मलमास मेला को क्यों नहीं मिला सकता है। …..परीक्षित नारायण ‘सुरेश ‘ सचिव, संस्कृति

इस मेले की सरकारी बंदोबस्ती होती है। राज्य सरकार को इससे मोटी राजस्व हासिल होती है। इसके बावजूद यह मेला सरकार से उपेक्षित है। 20 वीं सदी में जिस तरह इस मेला का आयोजन होता था उसी ढर्रे पर 21वी सदी में भी किया जा रहा है।

अंतर केवल इतना ही है कि मलमास मेला की बंदोबस्ती पहले लाखों में होती थी अब करोड़ों में होती है। सरकार को पहले लाखों रुपए राजस्व हासिल होते थे अब दो करोड़ से अधिक होती है।

“समाज और अध्यात्म के हित में एक महीने तक चलने वाले राजगीर के मलमास मेला को राजकीय मेला का दर्जा मिलना चाहिए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राजगीर के विकास के प्रति संवेदनशील हैं।

सीएम राजगीर के इतिहास को दोहराने के लिए एक से बढ़कर एक कार्य कर रहे हैं। उसी कड़ी में मलमास मेला है।

इस मेला को राजकीय मेला का दर्जा देकर मुख्यमंत्री रिकार्ड बना सकते हैं। …जनार्दन सिंह, जिला उपाध्यक्ष, भाजपा, नालंदा

राजगीर के इस ऐतिहासिक मलमास मेला को राजकीय मेला का दर्जा देने की मांग दशकों से उठाई जाती रही है। लेकिन दुर्भाग्य है कि अब तक स्थानीय जनप्रतिनिधि, जिला प्रशासन और राज्य सरकार ने इस मांग को तवज्जो नहीं दिया है।

यही कारण है कि आजादी के 70 साल गुजर जाने के बाद भी यह है मेला  प्रयाग,उज्जैन और देवघर  मेला जैसा दर्जा  नहीं पा सका है।

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