ई क्रूर हत्यारा श्रवण को धरती निगल गई या आसमां खा गया !

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” पत्नी, साली और तीन बच्चों के हत्यारे का अब तक सुराग नहीं। 22 अक्टूबर 2011 को होटल के एक कमरे में की थी हत्या। पटना पुलिस के लिए अब भी है श्रवण की गिरफ्तारी एक चुनौती”

पटना से वरिष्ठ पत्रकार विनायक विजेता की खोजपरक रिपोर्ट…..

22 अक्टूबर 2011 की वह काली रात। स्थान पटना का गांधी मैदान थाना अंतर्गत स्टेशन रोड पर स्थित होटल पालिका का कमरा नंबर-104, रात 9 बजे जब होटल के एक बेयरे ने खाने के आर्डर के लिए इस कमरे में परिवार के पांच अन्य सदस्यों के साथ ठहरे डेहरी निवासी श्रवण(42 वर्ष) को दस्तक दी तो कोई जवाब नहीं मिला। बेयरे ने इसकी जानकारी होटल मैनेजर को दी।

होटल मैनेजर ने जब डुप्लीकेट चाबी से कमरे का दरवाजा खोला तो उसके होश यह देख उड़ गए की बेड पर तीन मासूम सहित दो महिलाओं की लाशें पड़ी थी और श्रवण कमरे से गायब था। इस जघन्य और सनसनीखेज सामूहिक हत्या की सूचना मिलते ही तत्कालीन एसएसपी आलोक कुमार, तत्कालीन सिटी एसपी शिवदीप लांडे और तत्कालीन टाऊन डीएसपी रमाकांत प्रसाद होटल के कमरे में पहुंचकर छानबीन शुरु कर दी।

जांच के क्रम में यह पता चला की मरने वालों में श्रवण की पत्नी जयमाला देवी (36), साली नीलम कुमारी(26),पुत्र आदर्श(8) राज उर्फ छोटू(6) एवं पुत्री सोनी (5) शामिल हैं। एक पुत्र की गला दबाकर हत्या की गई थी, जबकि अन्य 4 की हत्या जहर देकर की गई थी।

प्रारंभिक जांच से ही यह साबित हो गया था कि क्रूर श्रवण ने ही सभी की हत्या जहर मिश्रित आइसक्रीम खिला कर करने के बाद कमरे में ताला बंद कर फरार हो गया। श्रवण को घटना की शाम होटल के कर्मचारियों ने बाहर से आइसक्रीम लेकर कमरे में जाते देखा था।

पुलिस को तब होटल के कमरे से श्रवण का लैपटॉप, नेपाल के एक होटल ‘होटल पशुपतिनाथ’ का विजिटिंग कार्ड और कुछ नेपाली रुपये मिले थे। जिससे यह अनुमान लगाया गया था कि श्रवण और उसका परिवार नेपाल घूमने के बाद 5 अक्टूबर को पटना आया और उसी दिन उसने होटल पालिका में एक कमरा (104) बुक करा लिया और फिर एक सोची-समझी साजिश के तहत सभी की हत्या कर फरार हो गया।

तब अनुमान यह लगाया जा रहा था कि कहीं श्रवण भी आत्महत्या न कर ले, इस आशंका को देखते हुए राज्य के संपूर्ण थाने और रेल थानों को एलर्ट कर दिया गया और उन्हें यह संदेश दिया गया कि कहीं भी 40 से 45 वर्ष के बीच किसी युवक की अज्ञात लाश मिलती है तो इसकी सूचना पटना पुलिस को अविलंब दी जाए।

आने वाले 22 अक्टूबर को इसघटना के छह वर्ष पूरे हो जाएंगे। पर इन छह वर्षों में न तो श्रवण की कहीं लाश मिली और न ही पुलिस अब तक इस क्रूर हत्यारे का कोई सुराग ही पा सकी। पटना पुलिस ने इन छह वर्षों में अब तक अपराध की कई अनुसुलझी समझी जाने वाली गुत्थी को सफलता पूर्वक सुलझाया है। पर श्रवण पटना पुलिस के लिए अबतक चुनौती बना हुआ है।

मूल रुप से रोहतास जिले के एक गांव का निवासी अति महत्वाकांक्षी श्रवण 2010 में डेहरी विधानसभा से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव भी लड़ा था जिस चुनाव में उसकी जमानत तक जप्त हो गई थी। चुनाव के बाद हुई आर्थिक तंगी से निपटने के लिए श्रवण ने तब कई बेरोजगार युवाओं से नौकरी के नाम पर लाखो रुपये हड़प लिए थे। उन्हीं रुपयें से वह अक्सर नेपाल और अन्य जगहों की सैर करता रहा।

आशंका जतायी जा रही है कि इस जघन्य और सामूहिक हत्या की घटना को अंजाम देने के बाद श्रवण नेपाल भाग गया और तब से वह वहीं छुपकर रह रहा है। घटना के बाद पुलिस ने श्रवण के भाई पारसनाथ से भी पूछताछ की थी। पर श्रवण का कोई सुराग हासिल नहीं कर पाई।

वेशक दिल को झकझोर देने वाला यह जघन्य और सनसनीखेज हत्याकांड को अंजाम देने वाले क्रूर हत्यारे श्रवण का सुराग पाने में अबतक असफल पटना पुलिस के लिए यह असफलता अब तक कई कांडों में मिली सफलता पर उसी तरह पानी फेरते हुए ‘मखमल के कालीन पर टाट का पैबंद’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा है।

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